आज की ताजा खबर

भारत, चीन और अमेरिका का जो त्रिकोण है, उसका बुनियादी तत्व अपनी जगह कायम है। दिल्ली और वाशिंगटन, दोनों अलग-अलग कारणों से बीजिंग की ताकत, हठधर्मिता और महत्वाकांक्षा को पसंद नहीं करते हैं। ये दोनों कभी अपने तईं, तो कभी मिलकर और कभी अन्य सहयोगी देशों के साथ चीन को रोकने के प्रयास कर रहे हैं। उधर, बीजिंग भी वाशिंगटन के प्रभुत्व या नई दिल्ली के बढ़ते कद से प्रसन्न नहीं होता। वह कभी अपने दम पर, तो कभी उन देशों के साथ मिलकर, जिन्हें वह एकजुट कर सकता है, नई दल्ली के खिलाफ दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन को और वाशिंगटन के खिलाफ व्यापक वैश्विक समीकरण को बदलने की कोशिशों में जुटा रहता है।
यह तस्वीर बदलने वाली नहीं है, मगर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इन देशों के शीर्ष नेता जिस व्यापक ढांचे में खुद को मुफीद पाते हैं, उसमें वे दिन-प्रतिदिन के आधार पर काम करते हैं। जैसे, अमेरिका को लीजिए। राष्ट्रपति जो बाइडन चीन के खिलाफ खासे मुखर हैं। उन्होंने मित्र राष्ट्रों का एक नेटवर्क बनाया है, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को मजबूत किया है और चीन की तकनीकी ताकत पर भी हमला बोला है। मगर उन्हें अगले वर्ष एक कठिन चुनाव का भी सामना करना हैै, जिसको जीतने के लिए उन्हें अन्य कारकों के अलावा वैश्विक शांति कायम करनी होगी। यूक्रेन युद्ध में परोक्ष भागीदारी से आम अमेरिकी की वैश्विक हस्तक्षेप की इच्छा खत्म हो रही है। फिर बाइडन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पटरी पर रहे, क्योंकि यहां मंदी की आशंकाएं बेशक कम हुई हैं, पर सुधार की रफ्तार काफी धीमी है और महंगाई अब भी चिंता का विषय है। इन सब कामों के लिए जाहिर है, चीन के साथ अपेक्षाकृत स्थिर संबंध ही मददगार माना जा रहा है।
जहां तक चीन की बात है, तो करीब 10 साल पहले राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव’ (बीआरआई) के साथ चीनी आक्रामकता के एक नए दौर की शुरुआत की थी। उन्होंने भले ही पिछले साल अपने तीसरे कार्यकाल की शुरुआत की है, मगर जन-दबाव में झुकने का दुर्लभ उदाहरण पेश करते हुए वह पार्टी कांग्रेस के तुरंत बाद कोविड-19 की अपनी नीति बदलने को बाध्य भी हुए। अभी वह चीन के इतिहास के सबसे गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैैं और उनकी नीति ने क्षेत्र में सहयोगी बनने वाले देशों की तुलना में कहीं अधिक राष्ट्रों को उनसे विमुख कर दिया है। बीजिंग के चारों ओर अचानक ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ बन गई है, जिससे घेरेबंदी की आशंका पैदा हो गई है। अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि भू-राजनीतिक बिसात को वह फिर से अपने हित में कर सकते हैं, शी जिनपिंग को फिलहाल संयमित रहना होगा।
भारत भी अपवाद नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संभवत यह उम्मीद करने लगे थे कि वह चीन के साथ एक नया रिश्ता बना सकते हैं। मगर 2014 में चूमार, 2016 में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह, 2017 में डोकलाम, 2020 में गलवान, अब तक पूर्वी लद्दाख और पड़ोसी देशों की राजधानियों में तीव्र प्रतिस्पर्द्धा ने उन्हें यही एहसास कराया है कि बीजिंग मूलत नई दिल्ली के विरोध में ही है। प्रधानमंत्री घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के साथ-साथ रक्षा और तकनीकी इकोसिस्टम बनाना चाहते हैं; पश्चिम, पूर्व और दक्षिण के साथ भारत की दोस्ती मजबूत करना चाहते हैं और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को भी सुनिश्चित करना चाहते हैं। मगर वह यह भी जानते हैं कि भारत को अपनी क्षमताएं बनाने और अंतर को पाटने के लिए अभी कुछ वक्त चाहिए, इसीलिए चीन एक ऐसा मसला है, जिस पर आक्रामक होने के बजाय उन्होंने रक्षात्मक मुद्रा अपनाई हैै। अगले साल उन्हें भी चुनाव का सामना करना है, इसलिए वह एक स्थिर सीमा चाह रहे होंगे और संभवत इससे भी वाकिफ होंगे कि बीजिंग उनकी राष्ट्रवादी छवि को खंडित कर सकता है।
चूंकि सारी राजनीति स्थानीय है, इसलिए अचानक मुलाकातों का दौर भी शुरू हो जाता है। यदि वाशिंगटन ने चार वरिष्ठ राजनेताओं (एंटोनी जे ब्लिंकन, जेनेट येलेन, जीना रायमोंडो और जॉन कैरी) को बीजिंग भेजा, तो दिल्ली ने मध्य देशों के साथ अपनी राजनीतिक व सैन्य भागीदारी बढ़ा दी। चीन बेशक इसकी अनदेखी करने का दिखावा कर सकता है, लेकिन शायद वह ज्यादा असुरक्षित है, क्योंकि अर्थव्यवस्था पर ही उसके शासन की राजनीतिक वैधता टिकी हुई है।
हालांकि, तीनों में से कोई भी देश यह भ्रम नहीं पाल रहा कि इनके बीच प्रतिस्पर्द्धा की प्रकृति बदल जाएगी। भले ही इन देशों में सहभागिता बढ़ी है, पर इनमें प्रतिस्पर्द्धी गतिविधियां भी समान रूप से बढ़ रही हैं। वाशिंगटन ने बीजिंग को निशाना बनाते हुए तकनीकी निवेश संबंधी नए प्रतिबंध लगा दिए हैं और चीन के खिलाफ एक नया त्रिकोण बनाते हुए टोक्यो और सियोल को एक साथ किया है। बीजिंग ने यह दिखाने के लिए ब्रिक्स का विस्तार किया है कि उसके पास भी मित्र देश हैं। वह वाशिंगटन को दूर धकेलने की मुद्रा बनाए हुए है और एलएसी पर भी अपनी स्थिति बदलने का कोई संकेत नहीं दे रहा। भारत भी अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूती देने का काम जारी रखेगा। जी-20 बैठक से इतर भी प्रयास होंगे। भारत अगले साल क्वाड शिखर सम्मेलन की भी मेजबानी करेगा और यह अपने रक्षा औद्योगिक आधार को आधुनिक बनाने के साथ-साथ घरेलू रुकावटों को भी दूर करने की कोशिश करेगा।
ऐसे में, सैन्य तनातनी का दांव नुकसानदेह हो सकता है। दिल्ली और वाशिंगटन की दोस्ती को बीजिंग बेशक कमजोरी समझ सकता है और आर्थिक सुस्ती के बावजूद अपनी जनता पर पकड़ मजबूत बनाने के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अति राष्ट्रवाद का सहारा ले सकती है। मगर कोई भी दुस्साहस प्रतिक्रिया को जन्म देगा, क्योंकि न तो जो बाइडन और न ही नरेंद्र मोदी चीनी आक्रामकता पर आंखें मूंदे रखने का जोखिम उठा सकते; वह भी तब, जब उनके घरेलू प्रतिद्वंद्वी नरम रुख अपनाने के लिए पहले से उन पर हमलावर हैं।
चीन ने अतीत में अपनी महत्वाकांक्षाओं की कीमत चुकाई है, इसलिए इस वक्त की बड़ी तस्वीर यही है कि तीनों देश एक-दूसरे पर नजर रखते हुए अपनी आंतरिक मजबूती में जुटे हैं। भू-राजनीति में कोई पूर्ण विराम नहीं होता, लेकिन एक संक्षिप्त अवधि के लिए यदि सभी पक्ष व्यावहारिक रुख अपनाते हैं, तो अगले दौर की तनातनी शुरू होने से पहले बयानबाजी और कार्रवाइयों में सुधार आ सकता है।
No comments:
Post a Comment