Sunday, September 3, 2023

अब स्त्रीवाद के आगे भी कुछ सोचना होगा

Real story  अब स्त्रीवाद के आगे भी कुछ सोचना होगा

 
अब स्त्रीवाद के आगे भी कुछ सोचना होगा
अब स्त्रीवाद के आगे भी कुछ सोचना होगा

उखाड़ फेंकना हमारी प्रस्तावना में शामिल भी नहीं, लेकिन बरगद की बराबरी में पीपल बोने की परंपरा का स्त्रीवादी विश्लेषण तो हम कर ही सकते हैं।

हिंदी के मध्यकालीन काव्य तथा सामाजिक सौंदर्यबोध में स्त्री-चित्रण के प्रति लेखकों और आलोचकों की हमेशा से विशेष रुचि रही है। इसी कारण मध्यकाल और पुनर्जागरण दौर की रचनाओं, रचनाकारों और दूर भविष्य तक को प्रभावित करने वाली प्रवृत्तियों को रेखांकित करने का प्रयास हाल ही में आई पुस्तक ‘स्त्री मुक्ति की सामाजिकी मध्यकाल और नवजागरण’ में किया गया है। प्रस्तुत है इस पुस्तक से एक अंश

स्त्री-मुक्ति की सामाजिकी मध्यकाल और नवजागरण

लेखिका अनामिका

प्रकाशक राजकमल पेपरबैक्स,

नई दिल्ली

मूल्य 250 रुपये

संभावना और चुनौतियां—दोनों सगी बहनें हैं! दोनों का एक-दूसरे के घर आना-जाना रहता है! जाना होता है तो साथ-साथ ही वे कहीं जाती हैं वरना नहीं जातीं। संभावना है तभी चुनौतियां हैं! चुनौतियां संभावना का मुंह जोहा करती हैं।

स्त्री-दृष्टि विकसित करें

चुनौतियों से ही बात शुरू करती हूं। सबसे बड़ी चुनौती तो स्त्रीवाद के आगे यह है कि वह मनुष्य मात्र में स्त्री-दृष्टि विकसित करे, स्त्री-दृष्टि यानी करुणासंबलित न्यायदृष्टि! करुणा और न्याय या क्षमा और न्याय सौतेले भाव नहीं हैं! न्याय की प्रस्तावना हिंसक तरीके से हो तो बात बन ही नहीं पाती! आक्रामक हुए बिना, बजिद रहा जा सकता है, अपने पक्ष पर कायम!

विद्रोह के प्रथम चरण में भी हम हिस्टेरिक तभी होते हैं, जब संघशक्ति का आभास हमें नहीं होता और अपनी शक्ति का अहसास भी नहीं! अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता, उड़कर भड़भूंजे की आंख जरूर फोड़ सकता है! लेकिन आंख फोड़ देना स्त्रीवाद का उद्देश्य नहीं है।

भाड़ झोंकने वाले भाड़ फोड़ने का संकल्प लिए बैठे हैं तो सबसे पहले ये ही समझें कि यह भाड़ और यह संरचना है क्या जो तोड़ने की जरूरत पड़ी! पितृसत्ता भी नहीं, मैं तो इसे पितर- सत्ता कहना चाहूंगी क्योंकि इसकी जड़ें बरगद की जड़ों की तरह हमारी अंतश्चेतना पर संस्कार रूप में बैठी हैं। बरगद उखाड़ना इतना आसान इसलिए भी नहीं होता कि उससे हमारा संस्कारगत जुड़ाव है, उससे हमें छांह और ऑक्सीजन भी मिलती है।

उखाड़ फेंकना हमारी प्रस्तावना में शामिल भी नहीं, लेकिन बरगद की बराबरी में पीपल बोने की परंपरा का स्त्रीवादी विश्लेषण तो हम कर ही सकते हैं। आम के बगल में महुआ, बरगद के पास पीपल परंपरा भी बोती है। एक ही ऊंचाई के हैं ये दोनों पेड़। एक मेल प्रिंसिपल है, एक फीमेल प्रिंसिपल। पूरब की शादियों में दोनों पेड़ों का ब्याह भी रचाते हैं। वररुचि के पर्यावरण-विज्ञान से प्रेरणा लेकर पुरुष समानांतर स्त्री की ऊंचाई क्यों नहीं बर्दाश्त की जाती!

सबसे बड़ी चुनौती

जीवन की हरियाली के सेक्यूलर लोकतंत्र के पक्ष में शांति प्रस्तावना है स्त्री-विमर्श और सबसे बड़ी चुनौती तो इसके सामने यही है कि स्त्रियों की एक स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी और एक स्वतंत्र मीडिया ये विकसित करें। अभी नहीं तो कब? अभी तो हमारे बहार के दिन हैं! जमीन पक रही है! आकाश की आंखें जरा-जरा-सी नम हैं। स्टेट की ताकत कम हो गई है। वृद्ध जटायु-भाव से एक ओर आहत-सा बैठा है—‘हा राम, हा सीता’ कहता हुआ! राज्येतर-राष्ट्रेतर संरचनाएं अधिक प्रभावी हैं। इतने दिनों से सुनते आए हैं कि घूरे के भी दिन फिरते हैं। अभी भी घूरा खामोश रहे, तब तो बदल चुके उनके दिन! अधिक-से-अधिक उन पर जमदियरी रख जाएगा कोई। कुछ कॉस्मेटिक बदलाव घटित हो लेंगे, उस तरह के कॉस्मेटिक बदलावों को दिन फिरना थोड़े ही कहते हैं। जब तक स्त्रियों की अपनी एक स्वतंत्र पार्टी नहीं होगी; अपना पब्लिक स्फियर, अपना मीडिया नहीं होगा, घूरे के दिन नहीं फिरेंगे। जिस तरह नागरिकता दोहरी होती है, पार्टी की सदस्यता भी दोहरी क्यों नहीं हो सकती!

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