
मतदान के लिए लगी लाइन। आने वाले दिनों में शायद एक ही बार में दो वोट डालने का मौका लोगों को मिल सकता है।





साल 2018 में विधि आयोग ने कहा, बचेगा बहुत पैसा और संसाधन
कानूनी मामलों के विभाग ने अप्रैल 2018 में भारत के विधि आयोग से एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे की जांच करने के लिए कहा था। 30 अगस्त, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बीएस चौहान की अध्यक्षता में आयोग ने इस विषय पर एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें एक साथ चुनाव कराने का पक्ष लिया गया, लेकिन साथ ही, अंतिम निर्णय से पहले राजनीतिक दलों और अन्य हितधारकों के साथ आगे विचार-विमर्श को प्राथमिकता दी गई थी। इस आयोग ने भी दोहराया कि एक साथ चुनाव कराने से धन की बचत होगी; प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा बलों पर बोझ कम होगा; सरकारी नीतियों का समय पर क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा, प्रशासनिक मशीनरी चुनाव प्रचार के बजाय विकास गतिविधियों में ज्यादा लग पाएगी।
संसदीय समिति की सिफारिश
साल 2015 में संसदीय स्थाई समिति की 79वीं रिपोर्ट आई थी। संसदीय पैनल या समिति ने भी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने की व्यावहारिकता पर अपनी रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराने के कई औचित्य बताए थे। रिपोर्ट में कहा गया कि एक साथ चुनाव कराने से हर साल अलग-अलग चुनाव कराने पर होने वाला भारी खर्च कम हो जाएगा, साथ ही, चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) लागू होने से नीतिगत पंगुता के कारण सामान्य शासन और विकासात्मक कार्यों पर गंभीर असर पड़ता है। समिति के अनुसार, एक साथ चुनाव से आवश्यक सेवाओं पर प्रभाव और चुनाव के समय तैनात महत्वपूर्ण जनशक्ति पर बोझ कम हो जाएगा।
नचियप्पन समिति ने कहा था
सांसद ईएम सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता में संसदीय स्थाई समिति ने कहा था कि अब तक गठित 16 लोकसभाओं में से सात गठबंधन सरकारों के चलते समय से पहले भंग हो गईं।
समिति ने सिफारिश की कि चुनाव दो चरणों में कराए जा सकते हैं, इसमें कहा गया है कि कुछ विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा के मध्यावधि में हो सकते हैं। शेष विधानसभाओं के चुनाव वर्तमान लोकसभा के कार्यकाल की समाप्ति के साथ हो सकते हैं। समिति ने बताया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 चुनाव आयोग को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त होने से छह महीने पहले आम चुनावों को अधिसूचित करने की अनुमति देता है।
नीति आयोग ने भी कर दी थी सिफारिश
जनवरी 2017 में नीति आयोग ने एक साथ चुनावों का विश्लेषण क्या, क्यों और कैसे शीर्षक से एक दस्तावेज या अध्ययन पत्र तैयार किया था, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव पर विचार-विमर्श किया गया। रिपोर्ट में एक साथ चुनावों से संबंधित मौजूदा सांविधानिक प्रावधानों, वित्तीय और तार्किक निहितार्थों का विश्लेषण किया गया और एक साथ चुनावों के संचालन के लिए एक रूपरेखा भी तैयार की गई। नीति आयोग के बिबेक देबरॉय और किशोर देसाई ने बताया कि 2009 के चुनावों में सरकारी खजाने को लगभग 1,115 करोड़ रुपये और 2014 के चुनावों में लगभग 3,870 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा किए गए खर्चों को मिलाकर चुनावों पर कुल खर्च कई गुना अधिक था।
अध्ययन पत्र में कहा गया कि स्थाई चुनावी मोड से बाहर निकलना होगा। सरकारों को अगले आसन्न चुनावों की चिंता किए बिना दीर्घकालिक कदमों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए जरूरी समय मिलेगा।
समिति ने बताया था कि कब-कब चुनाव कराए जाएं
नचियप्पन समिति ने साल 2015 में अपनी रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया था कि विधानसभा चुनाव का प्रस्तावित पहला चरण नवंबर 2016 में आयोजित किया जा सकता है। सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव, जिनका कार्यकाल नियत चुनाव तिथि से पहले या बाद में छह महीने से एक वर्ष के भीतर समाप्त होता है, उन्हें एक साथ जोड़ा जा सकता है। इसी तरह दूसरे चरण के विधानसभा चुनाव 2019 में लोकसभा के आम चुनाव के साथ हो सकते हैं। समिति की सिफारिशों पर अब नए सिरे से विचार किया जा रहा है।
एक साथ चुनाव कराने के लिए तीन विकल्प
साल 2018 में विधि आयोग की रिपोर्ट में यह कहा गया कि संविधान के मौजूदा ढांचे में एक साथ चुनाव नहीं कराए जा सकते, क्योंकि इसके लिए संविधान में उचित संशोधन की जरूरत होगी, और कम से कम 50 प्रतिशत राज्यों द्वारा सांविधानिक संशोधनों की जरूरत होगी। आयोग ने कहा कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और लोकसभा व विधानसभाओं की प्रक्रिया के नियमों में भी संशोधन करना होगा। इस रिपोर्ट में चुनाव एक साथ कराने के तीन विकल्प दिए गए।
पहला विकल्प
पहले विकल्प के रूप में आयोग ने कुछ राज्यों में चुनाव का समय आगे बढ़ाने या स्थगित करने की सिफारिश की, ताकि 2019 में सभी राज्यों की विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराए जा सकें।
दूसरा विकल्प
आयोग के अनुसार, दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि 13 राज्यों के चुनाव 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ कराए जा सकते हैं और बाकी 16 राज्यों और विधानसभा वाले एक केंद्रशासित प्रदेश के चुनाव साल 2021 में कराए जा सकते हैं, ताकि चुनाव एक साथ हो सकें। इस प्रकार चुनाव पांच वर्षों में केवल दो बार आयोजित किए जा सकते हैं।
तीसरा विकल्प
यदि एक साथ चुनाव कराना संभव नहीं हो, तो एक कैलेंडर वर्ष में होने वाले सभी चुनाव वर्ष के ऐसे हिस्से के दौरान एक साथ आयोजित किए जा सकते हैं, जो इसमें शामिल राज्य विधानसभाओं के अनुकूल हों। हालांकि, आयोग ने आगाह भी किया कि लोकतंत्र पर एक साथ चुनाव के प्रभाव, संविधान की बुनियादी संरचना और देश की संघीय राजनीति सहित कई मुद्दे हैं, जिन पर अधिक विचार की आवश्यकता है।
केंद्र सरकार ने एक देश एक चुनाव की व्यावहारिकता का आकलन करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है। दिलचस्प बात यह है कि समिति बनाने का फैसला सरकार द्वारा 18-22 सितंबर तक संसद का विशेष सत्र बुलाने की घोषणा के ठीक एक दिन बाद आया। इस घटनाक्रम की कई विपक्षी पार्टियों ने आलोचना की है, जिन्होंने इसे संसद और राजनीतिक दलों के परामर्श के बिना एकतरफा निर्णय बताया है और दावा किया है कि सरकार के इस कदम का मकसद विपक्ष की निष्पक्ष चुनाव की मांग से ध्यान भटकाना है।
इस समिति का गठन 2014 में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद से एक साथ चुनाव कराने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा के अनुरूप है। राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद और उससे पहले उनके पूर्ववर्ती प्रणब मुखर्जी ने अपने भाषणों में इसका समर्थन किया था।
एक साथ चुनाव सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं है, इसमें वैधता के जटिल प्रश्न और सांविधानिक व्याख्या के मामले भी शामिल हैं। एक साथ चुनावों के खिलाफ उठाए गए तर्कों में से एक यह है कि इससे लोकतंत्र के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है, इससे संविधान की मूल संरचना और भारतीय राजनीति की संघीय संरचना के साथ छेड़छाड़ होता है। एक देश एक चुनाव की अवधारणा में गहराई से उतरने से इस विचार के इतिहास व संभावना पर प्रकाश डाला जा सकता है, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार उत्सुक है।
यह कोई नई बात नहीं
भारत में एक साथ चुनाव कोई नई बात नहीं है। साल 1967 तक देश में चुनाव एक साथ ही होते थे। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए आम चुनाव 1951-52, 1957, 1962 और 1967 के दौरान एक साथ आयोजित किए गए थे। हालांकि, 1968 और 1969 में कुछ राज्य विधानसभाओं के भंग होने के कारण, इसके बाद साल 1970 में लोकसभा के विघटन और उसके बाद 1971 में आम चुनावों के कारण एक साथ चुनावों का चक्र बाधित हो गया।
आजादी के बाद कुछ दशकों तक एक साथ चुनाव कराने के पीछे एक कारण एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल - कांग्रेस का प्रभुत्व था। क्षेत्रीय पार्टियां शक्तिशाली एवं प्रभावशाली नहीं थीं। राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 356 का बार-बार उपयोग करने से भी एक साथ चुनावों में व्यवधान पैदा हुआ। 1966 से 1977 के बीच विभिन्न राज्यों में 39 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
भारत के चुनाव आयोग ने पहली बार 1983 में एक साथ चुनाव कराने का विचार रखा था। अपनी पहली वार्षिक रिपोर्ट में आयोग ने सात प्रमुख कारणों को सूचीबद्ध करते हुए लोकसभा और विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश की थी। इनमें अलग-अलग चुनाव कराने के कारण होने वाले प्रशासनिक और अन्य खर्चों पर काफी बचत की बात शामिल थी। चुनाव आयोग का दृढ़ विचार था कि सम्मेलन द्वारा एक व्यवस्था विकसित करने का एक चरण आ गया है। हालांकि, इस रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं की गई या इसे आगे की चर्चा के लिए नहीं रखा गया।
1999 में विधि आयोग की रिपोर्ट
साल 1999 में भारत के विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट चुनावी कानूनों में सुधार से संबंधित थी। न्यायमूर्ति बी पी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में आयोग ने बताया कि 1967 के बाद, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के एक साथ चुनाव कई कारणों से बाधित हुए, जिनमें अनुच्छेद 356 का उपयोग और राज्यपाल द्वारा सिफारिश पर राज्य विधानसभा को भंग करना शामिल था। आयोग ने कहा कि यद्यपि उन सभी स्थितियों और घटनाओं का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, जिनमें राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए अनुच्छेद 356 का सहारा लिया जा सकता है, पर राज्य विधानसभाओं के लिए अलग-अलग चुनाव कराना एक अपवाद होना चाहिए न कि नियम। इसमें कहा गया है कि लोकसभा और सभी विधानसभाओं के लिए पांच साल में एक बार चुनाव होना चाहिए।
आयोग ने यह स्वीकार किया कि हर पांच साल में एक चुनाव का वांछित लक्ष्य रातोरात हासिल नहीं किया जा सकता और चुनाव कार्यक्रम में कुछ समायोजन करना होगा, एक सांविधानिक संशोधन से समस्या का समाधान हो सकता है। इस तरह के संशोधन में एक या एक से अधिक विधानसभाओं के कार्यकाल को बढ़ाने या कम करने का भी प्रावधान किया जा सकता है, जैसे छह महीने या उससे अधिक के लिए, जहां भी आवश्यक हो, यदि सभी राजनीतिक दल सहयोग करते हैं, तो आवश्यक कदम किसी भी राजनीतिक दल के हित को नुकसान पहुंचाए बिना उठाया जा सकता है।
यदि विधानसभाओं की शर्तों या कार्यकाल को छोटा नहीं किया जाना है, तो आयोग ने एक वैकल्पिक प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया। एक उचित समाधान यह हो सकता है कि लोकसभा / विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं, लेकिन संबंधित विधानसभा के कार्यकाल की समाप्ति तक चुनाव के परिणामों को रोक दिया जाए, ध्यान रखा जाए कि यह अंतराल छह महीने से अधिक नहीं होना चाहिए। वैसे, कुछ अच्छी सिफारिशों के बावजूद इस रिपोर्ट को बाद की सरकारों ने आगे नहीं बढ़ाया।
2022 में आयोग की सिफारिश
दिसंबर 2022 में भारत के 22वें विधि आयोग ने अपनी 2018 मसौदा रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में एक साथ चुनाव कराना न केवल आदर्श है, बल्कि वांछनीय भी है। इस आयोग ने देश में एक साथ चुनाव कराने की व्यावहारिकता परखने के लिए छह प्रश्नों का एक सेट तैयार किया और सुझाव आमंत्रित किए।
इनमें से एक सवाल में यह पूछा गया कि क्या एक साथ चुनाव कराना किसी भी तरह से लोकतंत्र, संविधान की मूल संरचना या संघीय राजनीति के साथ छेड़छाड़ है। जहां किसी भी राजनीतिक दल के पास सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं है, वहां यह प्रस्तावित है कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चयन या नियुक्ति उसी तरह की जाए, जैसे सदन या विधानसभा के अध्यक्ष का चुनाव किया जाता है। यदि हां, तो क्या यह संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के अनुरूप होगा?
इसमें आगे पूछा गया कि क्या 2018 की मसौदा रिपोर्ट में की गई कोई भी सिफारिश सांविधानिक योजना का उल्लंघन करती है। हालांकि, आयोग ने अभी तक इस मामले पर अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की है।
नरेंद्र मोदी सरकार ने ऐसे समय में बहस फिर से शुरू की है, जब नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों - मिजोरम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसके बाद अगले अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव होने हैं। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश विधानसभाओं के लिए 2024 में लोकसभा चुनाव के साथ चुनाव होने हैं।
वर्षों तक विचार से पता चलता है कि एक देश एक चुनाव लागू करने से देश में जो नया चुनावी परिदृश्य आकार लेगा, उसके लिए चुनाव कार्यक्रम, सांविधानिक संशोधन और कानूनी परिवर्तनों में आवश्यक समायोजन करने के लिए एक व्यापक रोड मैप के अलावा, व्यापक द्विदलीय सहयोग और राजनीतिक सहमति की जरूरत है। एक देश एक चुनाव को आकार देने में एक मजबूत सार्वजनिक चर्चा और संबंधित पक्षों की भागीदारी की आवश्यकता पर भी बहुत जोर दिया गया है।
No comments:
Post a Comment