अंतरिक्ष मिशनों से पृथ्वी की कक्षा और चंद्रमा पर बढ़ता जा रहा कचरा



टक्सन (अमेरिका), एजेंसी। अंतरिक्ष मिशन की बढ़ती संख्या के साथ ही पृथ्वी की कक्षा और चंद्रमा पर कचरा बढ़ रहा है। इस समय चंद्रमा पर बहुत सारा कचरा जमा है। जिसमें लगभग 100 बैग मानव अपशिष्ट भी शामिल हैं। विशेषज्ञों ने अंतरिक्ष में बढ़ते कचरे को लेकर चिंता जताई है।
कन्वर्सेशन पर प्रकाशित विश्लेषण में एरिजोना विश्वविद्यालय के खगोल विज्ञान के प्रोफेसर क्रिस इम्पे ने कहा कि पिछले महीने रूस का लूना 25 यान चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जबकि भारत का चंद्रयान-3 सफलतापूर्वक उतरा। दुनिया के कई देश चंद्रमा की यात्रा करनेवाले हैं इसके अलावा अंतरिक्ष मिशनों में और भी बहुत कुछ होने वाला है। अंतरिक्ष मलबे को साफ करने की नीति नहीं होना चिंता का विषय है।
चांद पर अधिक देशों के उतरने के साथ ही पृथ्वी पर लौटने वाले लोगों को यह सोचना होगा कि चंद्रमा की सतह और कक्षा में छोड़े गए सभी लैंडर्स, अपशिष्ट और अन्य मलबे का क्या होगा।
अंतरिक्ष कचरे की समस्या
क्रिस इम्पे ने कहा कि अंतिरक्ष की बढ़ती गतिविधि खतरे और मलबा पैदा करती है। मनुष्यों ने चांद पर बहुत कबाड़ छोड़ दिया है। 1978 में, नासा के वैज्ञानिक डोनाल्ड केसलर ने ऐसे परिदृश्य का वर्णन किया जहां परिक्रमा कर रहे मलबे के टुकड़ों में टकराव से ज्यादा मलबा बनता है। मलबे की मात्रा तेजी से बढ़ती है, जो पृथ्वी के निकट की कक्षा को अनुपयोगी बना देती है।
अंतरिक्ष में जाने की होड़
अंतरिक्ष प्रक्षेपण विशेषज्ञ जॉनाथन मैकडॉवेल ने कहा, लोग अंतरिक्ष को विशाल और ़खाली समझते हैं, लेकिन पृथ्वी के निकट के वातावरण में भीड़ होने लगी है। अगले एक दशक में सरकारों तथा निजी कंपनियों की100 से अधिक मिशनों की योजना है। अभी पृथ्वी के कुछ सौ मील के दायरे में करीब 7,700 उपग्रह हैं। यह संख्या 2027 तक कई लाख हो़ सकती है।
चंद्रमा पर किसी का स्वामित्व नहीं
1967 की संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष संधि कहती है कि कोई भी देश चंद्रमा या उसके किसी भी हिस्से का स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता है। लेकिन संधि कंपनियों और व्यक्तियों के बारे में कुछ नहीं कहती। 1979 के संयुक्त राष्ट्र चंद्रमा समझौते में माना गया कि चंद्रमा और उसके प्राकृतिक संसाधन मानवता की साझी विरासत हैं। लेकिन अमेरिका, रूस और चीन ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए।
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