Thursday, September 7, 2023

पूरे देश में एक साथ चुनाव होने चाहिए

 पूरे देश में एक साथ चुनाव होने चाहिए

 बीजेपी केंद्रीय चुनाव समिति ऐसा दिख रहा है कि 
एक देश एक चुनाव केंद्र सरकार ‘एक देश, एक चुनाव’ को अमलीजामा पहनाने के लिए सक्रिय हो गई है। इस पर अध्यादेश भी लाया जा सकता है। इसकी जरूरत है, क्योंकि लंबे समय से देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव कराने की मांग उठती रही है। एक साथ चुनाव न होने से सरकारी कामकाज में रुकावट आती है, जन-धन की भी काफी बर्बादी होती है, सरकारी मशीनरी के चुनावी-कार्यों में लग जाने से जन-कार्यों में विलंब होता है, अध्यापकों को वक्त-वक्त पर चुनावी कार्यों में झोंक दिया जाता है, जिससे स्कूली बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, समाज में बेवजह का तनाव बना रहता है, ऐसी न जाने कितनी परेशानियों से हम जूझते हैं। इन सबसे मुक्ति दिलाने में ‘एक देश, एक चुनाव’ खासा कारगर सिद्ध हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही इसकी सदिच्छा जता चुके हैं। ऐसे में, इस पर सकारात्मक विचार-विमर्श करके सभी पक्षों को जनहित व देशहित में आगे बढ़ना चाहिए। जिस तरह से हमने ‘एक देश, एक कर’ को सफलतापूर्वक लागू किया, उसी तरह से ‘एक देश, एक चुनाव’ की परिकल्पना भी साकार कर सकते हैं। इस मुद्दे पर बिना विवाद किए विपक्ष को सरकार का साथ देना चाहिए।

शकुंतला महेश नेनावा, टिप्पणीकार

राष्ट्र के हित में है यह

जनसंख्या के आधार पर भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जिसमें हर समय कहीं-न-कहीं चुनाव होता ही रहता है। बार-बार चुनाव होने से एक ओर जहां देश को बहुत ज्यादा चुनावी खर्च उठाना पड़ता है और दूसरे विभागों के कर्मचारियों को अपना मूल काम छोड़कर चुनावी डॺूटी में लग जाना पड़ता है, वहीं बार-बार आचार संहिता लगने से देश के विकास-कार्यों में व्यवधान पैदा होता है। ज्यादातर नेतागण जनता के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करने के बजाय चुनावी मोड में ही रहते हैं। संभवत इन्हीं सब मुश्किलों के मद्देजनर वर्तमान सरकार आगामी समय में विधानसभाओं व लोकसभा के चुनाव साथ-साथ कराने के लिए सर्वसम्मति बनाने के प्रयास कर रही है। इस बाबत पूर्व-राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया है। मगर विरोधी दल महज विरोध के लिए इस पहल की ओलचना कर रहे हैं, जो उचित नहीं है। आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में एक साथ तमाम चुनाव होने की व्यवस्था थी ही, जो सफल भी हुई थी, तो फिर अब इसका विरोध क्यों किया जा रहा है? विपक्ष को नकारात्मक राजनीति छोड़ देनी चाहिए।

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