पूरे देश में एक साथ चुनाव होने चाहिए
शकुंतला महेश नेनावा, टिप्पणीकार
राष्ट्र के हित में है यह
जनसंख्या के आधार पर भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जिसमें हर समय कहीं-न-कहीं चुनाव होता ही रहता है। बार-बार चुनाव होने से एक ओर जहां देश को बहुत ज्यादा चुनावी खर्च उठाना पड़ता है और दूसरे विभागों के कर्मचारियों को अपना मूल काम छोड़कर चुनावी डॺूटी में लग जाना पड़ता है, वहीं बार-बार आचार संहिता लगने से देश के विकास-कार्यों में व्यवधान पैदा होता है। ज्यादातर नेतागण जनता के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करने के बजाय चुनावी मोड में ही रहते हैं। संभवत इन्हीं सब मुश्किलों के मद्देजनर वर्तमान सरकार आगामी समय में विधानसभाओं व लोकसभा के चुनाव साथ-साथ कराने के लिए सर्वसम्मति बनाने के प्रयास कर रही है। इस बाबत पूर्व-राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया है। मगर विरोधी दल महज विरोध के लिए इस पहल की ओलचना कर रहे हैं, जो उचित नहीं है। आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में एक साथ तमाम चुनाव होने की व्यवस्था थी ही, जो सफल भी हुई थी, तो फिर अब इसका विरोध क्यों किया जा रहा है? विपक्ष को नकारात्मक राजनीति छोड़ देनी चाहिए।
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