दुनिया के विकास में कम न पड़े पैसा raju bhai news blogger
News एक पुरानी कहावत है, आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अर्थव्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण और विकास एक सर्वोपरि आवश्यकता थी। इसने वैश्विक सहयोग से नियम-आधारित एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संरचना को जन्म दिया। दुनिया में अर्थव्यवस्थाओं को फिर खड़ा करने और विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय बैंक- इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकांस्ट्रक्शन ऐंड डेवलपमेंट (आईबीआरडी) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ)- साल 1944 में बनाए गए। तब से वर्ल्ड बैंक ग्रुप (डब्ल्यूबीजी) में रियायती धन के लिए इंटरनेशनल डेवलपमेंट एसोसिएशन (आईडीए), इंटरनेशनल फायनेंसियल कॉरपोरेशन (आईएफसी), मल्टीलेटरल इंवेस्टमेंट गारंटी एजेंसी (एमआईजीए), ग्लोबल एनवायरमेंट फेसिलिटी (जीईएफ) और ढेर सारे ट्रस्ट फंड शामिल हैं। दूसरी ओर, आईएमएफ के पास वैश्विक मौद्रिक सहयोग बढ़ाने, व्यापार व आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और समृद्धि को नुकसान पहुंचाने वाली नीतियों को हतोत्साहित करने का खास मिशन है।
अब सवाल यह कि बहुपक्षीय विकास बैंक या मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंक (एमडीबी) क्या है? वैसे, एमडीबी की कोई मानक परिभाषा नहीं है। हमने अपनी रिपोर्ट में दुनिया में 17 एमडीबी का उल्लेख किया है। इनमें अफ्रीकी विकास बैंक, एशियाई विकास बैंक, यूरोपीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक प्रमुखता से शामिल हैं। पिछले आठ दशक में इन संस्थानों ने दुनिया की अच्छी सेवा की है। ये वैश्विक वित्तीय संरचना के केंद्र में रहे हैं। अब तक इनके द्वारा हासिल कामयाबी के बावजूद, एक जबरदस्त भावना अब यह है कि इन संस्थानों ने वर्तमान स्वरूप में अपनी उपयोगिता गंवा दी है। दुनिया असामान्य चुनौतियों का सामना कर रही है। भू-राजनीतिक तनाव, ऋण का अस्थिर स्तर, निम्न आय वाले देशों में बढ़ती गरीबी और साझा वैश्विक समृद्धि में गिरावट के तत्काल समाधान की जरूरत है। इन चुनौतियों ने हमें फिर विचार-मंथन के लिए साथ ला बिठाया है।
दुनिया में विकास के लिए बढ़ती वित्तीय जरूरतें और ऋण वितरण में गिरावट एमडीबी को और अधिक हाशिये पर डालने लगी है। इसी पृष्ठभूमि में इन संस्थानों में सुधार करना जी-20 की मूल कोशिशों में शुमार है। इस पर चर्चा के लिए दुनिया के अनेक वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंकके गवर्नर (एफएमसीबीजी) समय-समय पर मिलते रहे हैं। गौर करने की बात है, जी-20 साल 1999 से अस्तित्व में आया और 2008 में ही इस संस्था को नेतृत्व के स्तर तक उठाया गया। उसके बाद ही समकालीन आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया। विश्व में आर्थिक प्रशासन में सुधार, वैसे तो बार-बार उठने वाला विषय है, पर इस मोर्चे पर जरूरी कामयाबी नहीं मिली है।
जर्मनी की जी-20 अध्यक्षता के समय कारगर प्रयास शुरू हुए और इतालवी अध्यक्षता में एमडीबी की ऋण क्षमता बढ़ाने के उपायों पर विचार किया गया। हालांकि, भारत के जी-20 की अध्यक्षता संभालने से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, यह जरूरी है कि हर लोकतांत्रिक राष्ट्र ऐसे बहुपक्षीय निकायों के सुधार पर जोर दे, ताकि वे वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के कार्य में आगे आ सकें।
इसीलिए यह आश्चर्य की बात नहीं थी कि भारत की अध्यक्षता के समय 12 और 13 फरवरी को एफएमसीबीजी की दूसरी बैठक में व्यापक संदर्भ के साथ एमडीबी को मजबूत करने पर एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह (आईईजी) गठित करने का फैसला लिया गया। इसी दिशा में एमडीबी समूह की पहली रिपोर्ट 18 जुलाई को गांधीनगर में पेश की गई। एमडीबी का सशक्तीकरण ट्रिपल एजेंडा नामक रिपोर्ट में देशों के बीच परस्पर सहमति या लक्ष्य को तीन गुना करने की सिफारिश शामिल थी। अत्यधिक गरीबी से लड़ना और समृद्धि साझा करने के लक्ष्य से परे, तीसरे लक्ष्य में सतत विकास के लक्ष्यों, जैसे जलवायु संरक्षण संबंधी कदम उठाना और अन्य वैश्विक जन-वस्तुओं के लिए पहल करना शामिल है। हमने अर्थात स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह ने महसूस किया कि इन तीन लक्ष्यों को पाने के लिए हमें अब से 2030 के बीच हर साल 3 ट्रिलियन डॉलर की जरूरत पड़ेगी। हमारा मानना है, इसमें से 2 ट्रिलियन डॉलर संबंधित देशों द्वारा बेहतर नीतियों व प्रोत्साहन से घरेलू स्तर पर जुटाए जा सकते हैं। इसके अलावा, 500 अरब डॉलर निजी क्षेत्र से जुटाए जा सकते हैं, जबकि 500 अरब डॉलर रियायती व गैर-रियायती वित्त सहित आधिकारिक विकास वित्तपोषण के माध्यम से जुटाए जा सकते हैं। कुल मिलाकर, एमडीबी की क्षमता को तिगुना कर प्रति वर्ष औसतन 120 अरब डॉलर से 400 अरब डॉलर तक जुटाए जा सकते हैं।
हमने ग्लोबल पब्लिक गुड्स या वैश्विक जन-वस्तुओं की वैश्विक चुनौतियों के लिए वित्तपोषण तंत्र के गठन का सुझाव भी दिया है। बेहतर परिचालन मॉडल से एमडीबी की क्षमता में पर्याप्त वृद्धि होगी। निजी पूंजी की तलाश ही आगे का रास्ता है। हमारे लिए कार्य प्रगति पर है। हम अक्तूबर में माराकेश में आईएमएफ और विश्व बैंक की वार्षिक बैठक के समय अपनी दूसरी रिपोर्ट पेश करना चाहते हैं।
अपने प्रयासों के दूसरे खंड में, हम इस दिशा में स्वाभाविक रूप से निजी क्षेत्र को संगठित और प्रेरित करने के लिए व्यापक सिफारिशें करना चाहते हैं। हम दुनिया के बहुपक्षीय विकास बैंकों के परिचालन और जवाबदेही प्रक्रियाओं में संरचनात्मक बदलाव के सुझाव देना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त, हम वैश्विक चुनौतियों के वित्तपोषण तंत्र के अभिनव प्रस्ताव की रूपरेखा तैयार करना चाहते हैं। एक परिवार के रूप में एकजुट होकर काम करने के लिए एमडीबी को सक्षम बनाने के तौर-तरीके सुझाना चाहते हैं। अंतत, हम एक कारगर रोडमैप देना चाहते हैं।
अब काम का समय आ गया है। हमें समय की गंभीरता, तत्परता और बड़े पैमाने पर कार्य की जरूरत को देखते हुए साथ मिलकर कदम उठाना चाहिए। सामान्य ढर्रे में चल रहा कार्य-व्यापार दुनिया की जरूरतों को पूरा नहीं करेगा। हमें अपने दृष्टिकोण, उपकरणों और तौर-तरीकों का फिर आविष्कार करना होगा। हमें नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को संरक्षित और मजबूत करना होगा। आज कारगर बहुपक्षीय विकास बैंक ऐतिहासिक जरूरत हैं।

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