आत्म ज्ञान का होना, न होना एक भ्रम है



‘आत्म ज्ञान’, ‘आत्म दर्शन’ आदि शब्द बहुत भ्रामक हैं। क्योंकि, स्वयं का ज्ञान कैसे हो सकता है? ज्ञान के लिए द्वैत चाहिए, दो चाहिए। जहां दो नहीं हैं, वहां ज्ञान कैसे होगा? दर्शन कैसे होगा? साक्षात कैसे होगा? वस्तुत ज्ञान, दर्शनादि सभी शब्द द्वैत जगत के हैं। और जहां अद्वैत है, जहां एक ही है, वहां वे एकदम अर्थहीन हो जाते हों तो कोई आश्चर्य नहीं। मेरी नजर में ‘आत्म दर्शन’ असंभव है। यह शब्द ही असंगत है।
मैं भी कहता हूं स्वयं को जानो। सुकरात ने यही कहा है। बुद्ध और महावीर ने, क्राइस्ट और कृष्ण ने भी यही कहा है। फिर भी स्मरण रहे कि जो जाना जा सकता है, वह स्व कैसे होगा? वह तो पर ही हो सकता है। जानना तो पर का ही हो सकता है। स्व तो वह है, जो जानता है। ‘स्व’ तो अनिवार्य रूप से जानता है। उसे किसी भी उपाय से नहीं बनाया जा सकता। तो फिर उसका ज्ञान कैसे होगा? ज्ञान तो नए का होता है। ज्ञाता का ज्ञान कैसे होगा? जहां ज्ञान है, वहां कोई ज्ञाता है, कुछ ज्ञेय है। वहां कुछ जाना जाता है और कोई जानता है। अब ज्ञाता को ही जानने की चेष्टा, क्या आंख को उसी आंख में देखने के प्रयास की भांति नहीं है? क्या कुत्तों को स्वयं अपनी ही पूंछ को पकड़ने की असफल चेष्टा करते आपने कभी देखा है? वे जितनी तीव्रता से झपटते हैं, उनकी पूंछ उतनी ही शीघ्रता से हट जाती है। इस प्रयास में वे पागल भी हो जाएं तो भी क्या उन्हें पूंछ की प्राप्ति हो सकती है?
एक बात और है कि आपके घर में रिक्त स्थान पर्याप्त है। वह यहीं है, और कहीं गया नहीं। आपने केवल उसे सामान से ढक लिया है। कृपा कर सामान बाहर करें तो आप पाएंगे कि वह भीतर आ गया है। वह तो भीतर ही है। सामान के डर से दुबक गया है। सामान हटाएं और वह अभी और यहीं है।
आत्म ज्ञान की विधि भी यही है। सोते-जागते, उठते-बैठते, सुख में, दुख में, ज्ञान में, अज्ञान में, मैं तो हूं ही। मेरा यह होना असंदिग्ध है। सब पर संदेह किया जा सकता है, लेकिन स्वयं पर तो संदेह नहीं किया जा सकता। जैसा कि देकार्त ने कहा है संदेह भी करूं तो भी मैं हूं, क्योंकि संदेह भी बिना उसके कौन करेगा?
लेकिन, यह ‘मैं’ कौन है? यह ‘मैं’ क्या है? कैसे इसे जानूं? हूं, सो तो ठीक, लेकिन, क्या हूं? कौन है? मैं हूं, यह असंदिग्ध है और क्या यह भी असंदिग्ध नहीं है कि मैं जानता हूं? मुझमें ज्ञान है, चेतना है, दर्शन है? यह हो सकता है कि जो जानूं, वह सत्य न हो, असत्य हो, स्वप्न हो, किंतु मेरे जानने की क्षमता तो सत्य है।
इन दो तथ्यों को देखें, विचार करें। मेरा होना—मेरा अस्तित्व और मेरी जानने की क्षमता—मुझमें ज्ञान का होना, इन दोनों के आधार पर ही मार्ग खोजा जा सकता है।
No comments:
Post a Comment