


इस समय समूचा देश जी-20 के भव्य आयोजन की चकाचौंध से रोमांचित है, पर एक सवाल भी उछल रहा है। इतने ताम-झाम से देश और देशवासियों को हासिल क्या हुआ? उत्तर के लिए मैं आपको 15 साल पीछे ले चलने की इजाजत चाहूंगा।
सितंबर, 2009 की बात है। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका में थे। मौका था जी-20 की बैठक का। उन दिनों रिवाज था कि स्वदेश लौटते वक्त जहाज में प्रधानमंत्री अपने साथ गए पत्रकारों से बात किया करते थे। उसी पत्रकार-वार्ता में सवाल पूछा गया G20 की तीन शिखर बैठकों के बाद, क्या आप हमें बता सकते हैं कि भारत के आम आदमी को इससे क्या हासिल हुआ? इन बैठकों से उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को क्या लाभ होता है?
मनमोहन सिंह का जवाब था- जब वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमराएगी, तो स्वाभाविक ही उसका कुछ असर हम पर भी पडे़गा... हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, उसमें परस्पर निर्भरता तेजी से बढ़ रही है और कोई भी मुल्क अपने लिए यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि अन्य प्रतिभागी देशों को छोड़कर अकेले अपने बूते सभी आर्थिक लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। इसलिए भारत के हित में भी यही है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था तरक्की करती रहे।
लगभग ऐसे ही सवाल-जवाब एक वर्ष पूर्व भी हुए थे।
नवंबर 2008 के जी-20 शिखर सम्मेलन और डॉक्टर मनमोहन सिंह की उस यात्रा को मैंने ‘कवर’ किया था। अमेरिका में वे कयामत के दिन थे। मैनहट्टन के बाजार में हर तरफ ‘बिकाऊ है’ के बोर्ड दिखते। लेहमन ब्रदर्स को दिवालिया घोषित हुए दो महीने बीत चुके थे, मगर आर्थिक बदहाली की तपिश चरम पर थी। हड़बड़ाए भारतीय उद्योगपति भी खर्चों में कटौती के साथ छंटनी की तैयारी कर रहे थे। आजादी के बाद पहली बार नौकरी-पेशा लोगों ने ऐसी असुरक्षा अपने सामने मुंह फाडे़ पाई थी। भारत उतना प्रभावित नहीं हुआ था, जितना डर फैलाया गया था। फिर भी, हजारों बेरोजगार हो गए थे और रियल एस्टेट धराशायी हो गया था।
दरअसल, सन् 1990 के दशक में ही तय हो गया था कि दुनिया एक ‘ग्लोबल विलेज’ की ओर बढ़ रही है। अब कोई भी देश ‘एकला चलो रे’ की नीति नहीं अपना सकता। यही वजह है कि दशक खत्म होने से पहले आ टपके एशियाई वित्तीय संकट से दुनिया हकबकाई हुई थी। आम राय थी कि आगे भी ऐसे दुर्दिन आ सकते हैं और उनसे निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत होगी। जी-20 का गठन 26 सितंबर, 1999 को इसी नीयत से किया गया था।
आरंभ में इस समूह में 19 मुल्कों व यूरोपीय संघ के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नरों को शामिल किया गया था, ताकि सामूहिक रणनीति और आम राय कायम की जा सके। उन्हीं के सार्थक प्रयासों का असर था कि इसे और प्रभावी बनाने के लिए शासनाध्यक्षों को आमंत्रित किया जाने लगा। वे गलत न थे। संसार के कुल व्यापार का 75 प्रतिशत और सकल घरेलू उत्पाद का 85 फीसदी इन देशों के पास है। इनका संभलना, आगे बढ़ना समूची धरती के लिए जरूरी था, जरूरी है।
इन तथ्यों के आलोकमें आसानी से समझा जा सकता है कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्यों ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ का नारा बुलंद कर रहे हैं।
क्या यह संगठन अपने मकसद में शत-प्रतिशत कामयाब रहा है?
यकीनन, नहीं। पिछले साल बाली में हुई जी-20 की बैठक में रूस और यूक्रेन के संघर्ष के चलते यह संगठन दो भागों में बंटा नजर आया था। इस बार भी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के सदर शी जिनपिंग नई दिल्ली नहीं आए। दोनों की अनुपस्थिति की वजह अलग-अलग है, मगर इस मामले में तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। वैश्विक व्यवस्था के हसीन सपने के बावजूद विभिन्न देशों में पारंपरिक विवाद हमारे समय की तल्ख हकीकत है। सन् 1920 में स्थापित ‘लीग ऑफ नेशन्स’ और उसकी असफलता के बाद नए संकल्पों के साथ 1945 में जन्मा संयुक्त राष्ट्र संघ अभी तक इन गुत्थियों को नहीं सुलझा सका है। कुलजमा 24 साल पहले जन्मे जी-20 से ऐसी उम्मीद करना ज्यादती नहीं, तो और क्या है?
हो सकता है कि आपके मन में सवाल उठ रहा हो कि भारत और भारतीयों को इसका कोई तात्कालिक लाभ मिला या नहीं? बताने की जरूरत नहीं कि जी-20 के विभिन्न समूहों की बैठकें देश के विभिन्न हिस्सों में बसे 60 प्रमुख शहरों में हुईं। इसके चलते वहां जबरदस्त ढांचागत विकास हुआ। अकेले केंद्र सरकार ने इसके लिए 990 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की थी। राज्य सरकारों ने जो खर्च किया, वह अलग है। मैं नोएडा में रहता हूं, काम के लिए दिल्ली जाता हूं और अक्सर नातेदारों से मिलने के लिए आगरा अथवा वाराणसी जाना होता है। इन सभी महानगरों में एक साल में जो विकास-कार्य हुए हैं, उनसे ये शहर न केवल सुंदर हुए, बल्कि लोगों की सुगमता भी बढ़ी है।
एक और प्रत्यक्ष तथा परोक्ष संदेश इस महाजुटान से निकला है।
गुजरी 22 से 24 मई तक श्रीनगर में जी-20 के पर्यटन समूह की बैठक हुई। बरसों बाद घाटी में अंतरराष्ट्रीय स्तर का ऐसा आयोजन हो सका था। इससे समूची विश्व बिरादरी में संदेश गया कि अनुच्छेद-370 की रुखसती और प्रदेश के विभाजन के बाद यह हिंसाग्रस्त इलाका अब अमन की ओर बढ़ रहा है। अपनी कूटनीतिक मजबूरियों के चलते जो देश यहां नहीं आ सके, उनकी ट्रैवल एजेंसियों के शीर्ष कार्यकारी यहां हाजिर थे। इससे आने वाले दिनों में विदेशी पर्यटकों के आवागमन की राह खुलेगी।
विपक्ष का आरोप है कि जी-20 की बैठकें हर साल किसी न किसी देश में होती हैं, लेकिन केंद्र सरकार इस मौके को चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। वे अपने तर्क को पुष्ट करने के लिए कहते हैं कि जिस तरह तमाम शहरों, कस्बों और गांवों में बड़ी-बड़ी स्क्रीन लगाकर नई दिल्ली जुटान का प्रदर्शन किया गया, वह आयोजन प्रधानमंत्री की छवि चमकाने और पुराने मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए किया गया। यह भारतीय राजनीति का पुराना नुस्खा है। मार्च, 1983 में जब गुट-निरपेक्ष देशों के शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत ने की थी, तो उसमें लगभग 100 मुल्कों के महाकाय नेता दिल्ली पधारे थे, तब भी ऐसा ही हुआ था। इसी तरह, सन् 1982 में एशियाई खेलों के आयोजन का भी राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया था। तब और आज में टेक्नोलॉजी के अलावा बस एक फर्क आया है, आलोचकों के चेहरे और ‘पोजीशन’ बदल गई है।
किसी भी जीवंत लोकतंत्र में विकास, साहचर्य और सियासत के रास्ते हमेशा हमराह नहीं बने रह सकते। हमें इस सच को समझना ही होगा।
हो सकता है कि आपके मन में सवाल उठ रहा हो कि भारत और भारतीयों को इसका कोई तात्कालिक लाभ मिला या नहीं? बताने की जरूरत नहीं कि जी-20 के विभिन्न समूहों की बैठकें देश के विभिन्न हिस्सों में बसे 60 प्रमुख शहरों में हुईं। इन सभी में एक साल में जो विकास-कार्य हुए हैं, उनसे ये शहर न केवल सुंदर हुए, बल्कि लोगों की सुगमता भी बढ़ी है।
पोर्ट्रेट यशवंत नामदेव
हिंदी में राजनीति और साहित्य के बीच एक खाई है, जो दिन-ब-दिन चौड़ी होती जा रही है। राजनीति के लोग साहित्य को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं। मानों यह कोई चीज ही नहीं हो। मानों साहित्य की उपेक्षा से उनका या देश का नुकसान नहीं होता हो किंतु, साहित्य बलवान तो है ही, और उसके झरने में पानी पीना अगर आपके लिए ग्लानि की बात है, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि उसका पानी सड़ रहा है और लोग उसे पी नहीं रहे हैं।
राजेंद्र बाबू की यह एक बहुत बड़ी विशेषता है कि वे साहित्य रचना को भी देश के नवनिर्माण का अंग मानते हैं और साहित्यिकों को समुचित आदर देकर वे साहित्य के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं। अन्य नेताओं के समान अंग्रेजी के प्रगाढ़ पंडित होते हुए भी वे आरंभ से ही हिंदी के प्रबल समर्थक और अनुरागी रहे हैं। आज से कोई तीस वर्ष पूर्व उन्होंने पटना में ‘देश’ नामक हिंदी साप्ताहिक की स्थापना की थी और तब से भाषा के प्रश्न पर सुझाव देकर, साहित्य-सम्मेलनों का सभापतित्व करके तथा ग्रंथों की रचना के द्वारा वे हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा करते ही आ रहे हैं। उनकी लिखी—‘चंपारन में गांधीजी’, ‘संस्कृत का अध्ययन’, ‘आत्मकथा’ और ‘बापू के कदमों में’ ये चार पुस्तकें हिंदी की अक्षय निधि हैं। विधान-परिषद् की समाप्ति पर अपने विचार प्रकट करते हुए उन्होंने अपनी जिन दो वेदनाओं का जिक्र किया, उनमें से एक यही थी कि— ‘भारतीय गणतंत्र का विधान मौलिक रूप से हिंदी में नहीं लिखा जा सका!’
उनके राष्ट्रपति हो जाने के बाद मैंने जानबूझकर उनसे मुलाकात की, ताकि इस संबंध में कुछ और हल्की-फुल्की बातें जनता को मालूम हो जाएं।
मैंने उनसे कहा, ‘बाबू आज मैं आपका साहित्यिक इंटरव्यू लेने आया हूं और सारे प्रश्न मैंने पहले से ही लिख रखे हैं।’ बाबू ने चौंक कर कहा, ‘साहित्यिक इंटरव्यू के क्या मानी? मैं कोई साहित्यिक थोड़े ही हूं।’
मैंने कहा, ‘आप ऐसा ही समझें, और हमारा आग्रह भी तो कोई वस्तु है।’ और मैंने झट पहला प्रश्न कर दिया—
● आप ‘अखिल भारतीय हिंदी साहित्य-सम्मलेन’ में पहले-पहल कब सम्मिलित हुए थे?
पहले ही अधिवेशन में। यही नहीं, बल्कि, हिंदी साहित्य सम्मलेन जैसी कोई संस्था कायम की जाए, इसके लिए मैंने थोड़ा-बहुत आंदोलन भी चलाया था और उसके लिए पत्रों में लेख भी लिखे थे। किंतु अब याद नहीं कि वे लेख कहां छपे थे। मुझमें यह विचार बंगीय साहित्य-परिषद् को देखकर उठा था, जो संस्था उन दिनों काफी कार्यशील थी।
● जब आप छात्र थे, उस समय हिंदी में किन कवियों की कविताएं आदर से पढ़ी जाती थीं?
हिंदी में उस समय भारतेंदु बाबू की रचनाओं की धूम थी और उनकी कविताओं के आगे बहुतों के दोहे-सवैये फीके पड़ रहे थे। अपने छात्र जीवन में हम लोग देवी प्रसाद ‘पूर्ण’ और श्रीधर पाठक जी की कविताओं को बड़े ही चाव से पढ़ते थे। आगे चलकर नवयुवक कवि मैथिलीशरण जी आए और उनकी रचनाएं भी आरंभ से ही लोकप्रियता प्राप्त करने लगीं।
● हिंदी के प्राचीन कवियों में आपको अधिक प्रिय कौन है?
तुलसीदास जी पर शुरू में ही जो भक्ति बैठी, वह आज भी ज्यों-की-त्यों है, बल्कि दिन-ब-दिन उनकी कविता मेरे लिए नवीन होती गई है। उनके सिवा, सूरदास की कविताओं से भी मैं विह्वल हो जाता हूं तथा वे मेरे हृदय को बहुत जोर से छूती हैं। इन दोनों के बाद मीरा और कबीर का स्थान आता है। तब भी तुलसीदास की रचनाएं मैंने सबसे पहले पढ़ी थीं और आज भी उन्हें पढ़ता रहता हूं।
● अंग्रेजी और उर्दू के किन कवियों पर आपका विशेष स्नेह है?
मैंने इन कवियों का विधिवत अध्ययन नहीं किया है; जहां-तहां से कुछ थोड़ा-बहुत देखभर गया हूं। तो भी उर्दू के कवि मियां नजीर अकबराबादी की कई चीजें मुझे बेहद पसंद हैं।
● छायावादी आंदोलन के बारे में आपका क्या कहना है?
मैंने उस आंदोलन की चर्चा दूर से ही सुनी थी; नजदीक से उसे देखने या समझने का मौका मुझे नहीं मिला। अतएव, उसके संबंध में मैं अपना कोई मत नहीं दे सकता।
● हिंदी और उर्दू के जीवित समकालीन कवियों के बारे में आपका क्या कहना है?
नाम तो मैंने कइयों के सुने हैं और उनकी छिटपुट रचनाएं भी देखी हैं, किंतु उनके संग्रह-विशेष को ठीक से देखने का मुझे अवसर नहीं मिला। हां, बाबू मैथिलीशरण जी गुप्त की ‘भारत-भारती’ की याद मुझमें अब भी बनी हुई है।
● आपने हिंदी में सबसे पहले क्या लिखा था?
सबसे पहले मैंने कुछ स्फुट लेख लिखे थे, जो उस समय के कई पत्रों में प्रकाशित हुए थे। बिहारी छात्र-सम्मलेन की ओर से हम लोग ‘यंग बिहार’ नामक एक मासिक पत्र निकाला करते थे, जिसमें हिंदी और अंग्रेजी की मिली-जुली रचनाएं प्रकाशित होती थीं। संभवत, मेरा पहला हिंदी लेख ‘यंग बिहार’ में ही छपा था। किंतु, ठीक से नहीं कह सकता कि मेरा पहला लेख कहां छपा— क्योंकि उन्हीं दिनों मैं पंडित पद्मसिंह जी शर्मा के ‘भारतोदय’ और पंडित जीवानंद जी शर्मा की ‘कमला’ में भी लेख लिखने लगा था। आगे चलकर ‘कमला’ कलकत्ता की जगह भागलपुर से निकलने लगी।
● आप कब लिखते हैं? दिन में या रात में?
कोई ठीक नहीं। जब समय मिल जाता है, कुछ लिख लेता हूं।
● आप पेंसिल से लिखना पसंद करते हैंया कलम से?
पेंसिल से तो मैं लिखता ही नहीं। मैं जो कुछ भी लिखता हूं, कलम से ही लिखता हूं।
● अपनी चारों पुस्तकों में से आप किसे सबसे ज्यादा पसंद करते हैं?
लिखने के बाद मुझे पुस्तकों को पढ़ने का अवकाश नहीं मिला है। यह तो आप लोग ही बता सकते हैं कि कौन-सी किताब कैसी है।
● आगे आप क्या लिखने का विचार कर रहे हैं?
अभी तो कोई योजना सामने नहीं है।
● अपनी शैली की सरलता और सहजता के संबंध में आपका क्या कहना है?
मैं न तो संस्कृत का पंडित हूं और न फारसी का विद्वान। ऐसी हालत में मैं जो कुछ लिखूंगा वह आसान छोड़ कर और क्या होगा।
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