Tuesday, September 5, 2023

लोक कल्याण ही ज्ञान का सार है

 लोक कल्याण ही ज्ञान का सार है

 
लोक कल्याण ही ज्ञान का सार है
लोक कल्याण ही ज्ञान का सार है

महात्मा बुद्ध रोज की तरह लोगों को प्रवचन दे रहे थे। प्रवचन के पश्चात लोग बुद्ध के सामने अपने प्रश्न और समस्याएं भी रखते, जिनका वे यथोचित समाधान भी करते। यह रोज का ही नियम था।

एक दिन प्रवचन के पश्चात एक व्यक्ति बुद्ध के पास आया। वह व्यक्ति बहुत परेशान और दुखी लग रहा था। उसकी परेशानी का कोई एक कारण नहीं था। उसके दिमाग में अकसर तरह-तरह के प्रश्न उठते थे, जिनका उसे कोई समाधान नहीं मिल रहा था। और यही उसकी परेशानी का कारण था।

बुद्ध ने उस युवक से पूछा कि कहो तुम्हारा क्या प्रश्न है? तुम क्या जानना चाहते हो? युवक ने बुद्ध के आगे सिर झुकाते हुए कहा कि मैं बहुत परेशान हूं। जीवन के कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर मैं खोज नहीं पा रहा हूं। बुद्ध ने शांत भाव से उसकी ओर देखते हुए कहा, ‘क्या प्रश्न हैं तुम्हारे?’ युवक ने बुद्ध की ओर कातर भाव से देखते हुए कहा कि जैसे—क्या ईश्वर का अस्तित्व है? आत्मा क्या है? इनसान मृत्यु के पश्चात कहां जाता है? स्वर्ग-नर्क क्या है? सृष्टि का निर्माण किसने किया? मेरे ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिनका मुझे उत्तर नहीं मिल रहा है। तभी कुछ और लोग भी वहां आ गए। वे सभी वहां शांत भाव से बैठ गए। बुद्ध ने उनकी भी समस्याएं सुनीं और उनको उन समस्याओं का समाधान भी बताया। बुद्ध बहुत धैर्यपूर्वक और शांत भाव से सभी को संतुष्ट कर रहे थे। लेकिन वह युवक यह सब देखकर परेशान हो रहा था। उसने बुद्ध से पूछ ही लिया कि आपका इन सांसारिक प्रश्नों में उलझने से क्या लाभ? आप तो महात्मा हैं। आप इनके दुखों से क्यों दुखी हो रहे हैं?

बुद्ध ने युवक की ओर शांत भाव से देखते हुए कहा, ‘मैं ज्ञानी नहीं हूं। मैं भी इनकी तरह ही इनसान हूं। इनके सुख-दुख, मेरे सुख-दुख हैं। इसलिए मैं इनके दुख से दुखी हूं। मेरा मानना है कि वह ज्ञान किस काम का जो इनसान को अहंकारी और आत्मकेंद्रित बना दे। जो दूसरों के बारे में सोचे ही नहीं। उसकी चिंता ही नहीं करे। ऐसे ज्ञानी से वह अज्ञानी भला, जिसके भीतर लोक कल्याण की भावना हो। मेरी दृष्टि में ज्ञान का सार लोक कल्याण करना है। असली ज्ञान लोक कल्याण ही है।’

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