Thursday, September 7, 2023

देश में गुणवत्तापूर्ण और किफायती संस्थान गिने-चुने हैं। आईआईटी स्नातकों को मिलने वाली मोटी तनख्वाह स्थिति को बदतर बना देती है। हमें शिक्षा में सुधार करना होगा।

 ताकि दबाव और तनाव में न आएं छात्र

भारत देश में गुणवत्तापूर्ण और किफायती संस्थान गिने-चुने हैं। आईआईटी स्नातकों को मिलने वाली मोटी तनख्वाह स्थिति को बदतर बना देती है। हमें शिक्षा में सुधार करना होगा।
 
ताकि दबाव और तनाव में न आएं छात्र

आज की खबर  :- कोटा की खबरें झकझोरती हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी व अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स जैसे नामचीन इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों में प्रवेश पाने के इच्छुक छात्र-छात्राओं के लिए यह शहर ‘कोचिंग राजधानी’है। यहां विद्यार्थियों को इन प्रवेश परीक्षाओं में सफल होने के लिए तैयार किया जाता है। मगर इन दिनों यहां के कोचिंग संस्थान एडवांस कैलकुलस या न्यूटनी यांत्रिकी पढ़ाने के बजाय आत्महत्या रोकने पर अधिक ध्यान लगा रहे हैं। इस साल अब तक यहां 23 छात्रों ने खुदकुशी की है, जो पिछले आठ साल में सर्वाधिक है। नतीजतन, फंदे से लटकने जैसी घटनाओं को रोकने के लिए छात्रावास के कमरों में स्प्रिंग लगे पंखे अनिवार्य कर दिए गए हैं। ऊंची इमारतों में स्टील से बने आत्महत्या-रोधी जाल लगाए गए हैं। ऐसी घटनाओं से चिंतित होकर फिलहाल कोचिंग संस्थानों में जांच-परीक्षा पर अस्थायी रोक लगा दी गई है। यहां के पुलिस स्टेशनों में छात्रों के लिए विशेष सेल बनाए गए हैं। कोचिंग संस्थानों में सैकड़ों परामर्शदाता हैं, जो उनमें पढ़ने वाले छात्रों में तनाव और अवसाद के शुरुआती लक्षणों का पता लगाते हैं। चौबीसों घंटे चलने वाले हेल्पलाइन क्लीनिक भी हैं।

बेशक खुदकुशी की रोकथाम काफी जटिल मामला है, पर इसका कारण हमें पता है। एक बड़ी वजह है, अपेक्षाओं का बोझ, विशेषकर माता-पिता का, जो कोचिंग फीस चुकाने के लिए अपनी पैतृक संपत्ति तक गिरवी रख देते हैं। लंबे समय तक काम करने, अवसाद और घर की याद भी खुदकुशी की अन्य वजहों में शामिल हैं। कोटा में अधिकांश छात्र बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से आते हैं। यहां यदि एक आत्महत्या होती है, तो सैकड़ों-हजारों ऐसे हतोत्साहित छात्र भी हैं, जिन्होंने अधीर होकर अपनी जान नहीं दी। फिर भी, पिछले तीन साल में कोटा में नामांकन दोगुना हो गया है। यहां दो लाख से अधिक अभ्यर्थी सप्ताह के सातों दिन 18-18 घंटे रोजाना पढ़ाई करते हैं।

शहर में ऐसे सैकड़ों कोचिंग संस्थान हैं, जो पेइंग-गेस्ट, खान-पान, परिवहन और अन्य सेवाओं से संपन्न स्थानीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यहां के कोचिंग उद्योग का सालाना कारोबार सभी आईआईटी और एम्स के कुल वार्षिक बजट से भी अधिक है। यह बिजनेस मॉडल तीन तरह के परीक्षार्थियों की जरूरतें पूरी करता है- फाउंडेशन, रनिंग और ड्रॉपर बैच। फाउंडेशन में वे बच्चे होते हैं, जो कक्षा सात से ही कोचिंग शुरू कर देते हैं। रनिंग बैच में ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी होते हैं और ड्रॉपर बैच में या तो 12वीं करने के बावजूद अगली कक्षा में दाखिला न लेने वाले छात्र होते हैं या फिर दूसरे प्रयास के लिए कोचिंग लेने वाले परीक्षार्थी। टॉपर्स को बतौर उदाहरण पेश करने के लिए खास व्यवस्था की जाती है। कहा यह भी जाता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के कुछ टॉपर्स को तो अच्छा-खासा भुगतान किया जाता है, ताकि कोचिंग संस्थान उनको अपने विज्ञापनों का चेहरा बना सकें।

आखिर यह नौबत आई ही क्यों? इसका कारण है, अच्छी गुणवत्ता वाले संस्थानों का अभाव और सफलता से बढ़ने वाला सामाजिक रुतबा। कोचिंग उद्योग बस इसी का फायदा उठा रहे हैं। छोटे शहरों या ग्रामीण इलाकों के बच्चों के लिए तस्वीर कहीं ज्यादा स्याह है, क्योंकि वहां माध्यमिक स्कूलों के पठन-पाठन का स्तर अमूमन महानगरों के स्कूलों से कमतर होता है। कोटा फैक्टरी इस कमी को पूरा करने का काम करती है। ठीक उसी तरह, जिस प्रकार घरेलू नलों या सार्वजनिक स्थानों पर पीने योग्य पानी के अभाव से बोतलबंद पानी का चलन बढ़ गया। या, सार्वजनिक परिवहन की कमी के कारण निजी ऑटो या टैक्सी उद्योग फलता-फूलता गया। या, सरकारी अस्पतालों में सेवा की कमी ने निजी अस्पतालों का जंजाल खड़ा कर दिया। यह कोई भारत का ही पैटर्न नहीं है। दुनिया भर में यही देखा गया है कि सार्वजनिक सेवा की कमजोरी निजी क्षेत्र के लिए बड़ा अवसर बन जाती है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मगर व्यापक रूप से यदि सुलभ हो, तो उच्च गुणवत्ता वाली सरकारी शिक्षा व्यवस्था निजी स्कूलों के असमान प्रभाव को कम कर सकती है, जो पीढ़ियों से असमानता फैलाते रहे हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण अमेरिका के आईवी लीग कॉलेज हैं, जहां 25 से 35 फीसदी दाखिला तो विरासत के आधार पर होता है, और यह अनुपात अनवरत नुकसानदेह साबित होता जा रहा है।

भारत में उच्च गुणवत्तापूर्ण और किफायती संस्थान बहुत कम हैं। आईआईटी स्नातकों को मिलने वाली मोटी तनख्वाह स्थिति को बदतर बना देती है। यही कारण है कि देश में ऐसे इंजीनियरिंग कॉलेजों की कमी नहीं, जहां की आधी सीटें खाली रह जाती हैं, जबकि आईआईटी में दाखिले के लिए होड़ मची रहती है, जिसमें प्रवेश की संभावना एक फीसदी से भी कम होती है। हाल के वर्षों में उच्च शिक्षा का बजट बढ़ाया गया है, जिससे आईआईटी व एम्स जैसे नए संस्थान खोलने की राह आसान हुई है। मगर तुलनात्मक रूप से उच्च शिक्षा पर हमारा खर्च अब भी काफी कम है। भारत जैसा राष्ट्र, जिसका लक्ष्य समावेशी विकास है, उच्च गुणवत्ता वाले मानव भंडार के बिना अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकता। ऐसी स्थिति में शिक्षा की यह उपेक्षा निंदनीय है। जाहिर है, हमें खर्च की उपयोगिता व अपने शासन मॉडल को परखना होगा।

कोटा सिंड्रोम इतना चर्चित है कि इसे नेटफ्लिक्स की एक सीरीज में भी दिखाया गया है। यह असल में कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक लक्षण है। कोचिंग कक्षाओं पर प्रतिबंध लगाने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा। प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता से मिलने वाले सामाजिक रुतबे को भी हमें घटाना होगा, ताकि छात्रों पर से तनाव और दबाव कम हो सके। इस बाबत नितिन पई और अजय शाह ने एक अभिनव तरीका सुझाया है। उन्होंने प्रवेश परीक्षा की जगह बुनियादी समझ रखने वाले छात्र-छात्राओं के लिए लॉटरी व्यवस्था अपनाने की बात कही है। अमेरिका में तकनीकी काम करने वाले कर्मियों के लिए एच1-बी वीजा लॉटरी की तरह सोचिए। इससे हमारे आईआईटी में विविधता आएगी और दोयम स्तर के कॉलेजों पर सुधार का दबाव बढ़ेगा, क्योंकि लॉटरी से चयनित न हो सकने वाले बच्चों को उन्हें अपने यहां समायोजित करना होगा। छात्रों को तनाव से बचाने के लिए अब हमें लीक से हटकर सोचना ही होगा।

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