अमेरिका में और मजबूत हुई भारतवंशियों की दावेदारी

India political map रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के लिए डिबेट की शुरुआत हो गई है। पिछले हफ्ते विस्कॉन्सिन के फिसर्व फोरम में हुई इस बहस में साउथ कैरोलिना की पूर्व गवर्नर निक्की हेली और ओहियो के 38 वर्षीय उद्यमी विवेक रामास्वामी ने असाधारण प्रदर्शन किया। दोनों दूसरी पीढ़ी के भारतवंशी अमेरिकी हैं और अलग-अलग रास्तों से इस मुकाम तक पहुंचे हैं। हेली ने पारंपरिक राजनीतिक राह पर चलते हुए विधायक, गवर्नर और संयुक्त राष्ट्र में अमरिकी राजदूत के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं, जबकि रामास्वामी राजनीति के नौसिखिया हैं, जो अरबों डॉलर के बायोफार्मा कारोबार के मालिक हैं और एक बेस्टसेलिंग किताब के लेखक भी।
इन दोनों के अलावा दो अन्य भारतवंशी अमेरिकी भी इस पार्टी की तरफ से नामांकन की दौड़ में हैं। इनमें से एक हैं, न्यू जर्सी के उद्यमी हर्षवर्द्धन सिंह और दूसरे, एमआईटी से पीएचडी करने वाले शिव अय्यादुरई। हालांकि, इन दोनों को उतना मजबूत दावेदार नहीं माना जा रहा, लेकिन देश के सर्वोच्च पद की दौड़ में उनकी मौजूदगी इस तथ्य को पुख्ता करती है कि अमेरिका के राजनीतिक फलक पर भारतीय अमेरिकियों का कद अनवरत बढ़ रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए किसी बड़ी पार्टी में इस तरह कोई भारतवंशी अमेरिकी मुकाबला करेगा, यह कल्पना करना कुछ दशक पहले तक काफी कठिन था। मगर अब चार-चार भारतवंशी रिपब्लिकन पार्टी में अपना दावा पेश कर रहे हैं, और यह स्थिति तब है, जब जनमत-सर्वेक्षण बताते हैं कि करीब दो-तिहाई भारतवंशी अमेरिकी मतदाता राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी पर भरोसा करते हैं। संभवत इसीलिए डेमोक्रेटिक में अनिवासी भारतीयों का दावा कहीं ज्यादा मजबूत है। इनमें बड़ा नाम अमेरिका की मौजूदा उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस का है, जिनकी मां भारत की थीं। हैरिस के बारे में कहा जाता है कि वह राष्ट्रपति पद से बस एक कदम दूर हैं। वह इस बार भी राष्ट्रपति जो बाइडन की साझेदार रहेंगी, क्योंकि बाइडन राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की अपनी इच्छा जाहिर कर चुके हैं। हैरिस के साथ करीब दर्जन भर अन्य भारतवंशी अमेरिकी भी इस चुनावी-चक्र में अलग-अलग पदों के लिए मुकाबले में होंगे, जिनमें से पांच निवर्तमान सांसद (अमी बेरा, रो खन्ना, प्रमिला जयपाल, राजा कृष्णमूर्ति और श्री थानेदार) होंगे।
‘इंडियन अमेरिकन इंपैक्ट’ नामक गैर-सरकारी संस्था का कहना है कि देश के अस्तित्व में आने के बाद से शुरुआती 226 साल में केवल पांच भारतवंशी अमेरिकी सार्वजनिक पदों के लिए चुने गए थे। मगर पिछले साल 176 से अधिक भारतवंशी अमेरिकी स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर के तमाम पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे थे। अगले साल भी इस तस्वीर के बने रहने की संभावना जताई जा रही है। बेशक कई उम्मीदवारों को ज्यादा लोकप्रियता नहीं मिल सकेगी, लेकिन उनके प्रयासों की सराहना जरूर की जानी चाहिए।
गुजरे दशक में अमेरिकी राजनीति में भारतवंशी अमेरिकियों ने अच्छी-खासी सफलता अर्जित की है। यह आलम तब है, जब स्थानीयता पर जोर देते हुए दक्षिणपंथी विचार लगातार मजबूत हो रहा है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ अभियान भी चलाया था। वास्तव में, भारतीय अमेरिकियों और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के उभार ने भी ट्रंप की राजनीति को बढ़ाने में योगदान दिया है, जिनकी राजनीति शिकायती रही है। फिर भी, कई भारतवंशी अमेरिकी रिपब्लिकनों का ट्रंप के प्रति आकर्षण है, जो विडंबना ही है। नतीजतन, ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के दावेदारों में सबसे पसंदीदा बने हुए हैं। देखा जाए, तो कुछ भारतवंशी अमेरिकी राष्ट्रपति पद की अपनी दावेदारी ट्रंप के माध्यम से ही हासिल करना चाहते हैं। रामास्वामी इसमें सबसे आगे दिखाई पड़ते हैं, जो ट्रंप के समर्थकों का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल हुए हैं।
बहरहाल, भारतवंशी अमेरिकियों की कामयाबी अमेरिका में तमाम अल्पसंख्यक समूहों के लिए अनुकरणीय उदाहरण है। व्यापक राजनीतिक परिवर्तनों के बीच भारतवंशियों की उपलब्धियां अमेरिका की विविधता और सकारात्मक बदलाव की क्षमता का प्रमाण हैं। वह भी तब, जब अमेरिका के कुल मतदाताओं में भारतवंशियों की हिस्सेदारी बमुश्किल एक फीसदी है।
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