आप कहीं गुस्से के गुलाम तो नहीं!


संतुलन बनाए रखें
क यह चेतना की ही शक्ति है कि आप स्वयं को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ पाते हैं और विपरीत हालातों में भी अपने चारों ओर फैली सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करके शांत रह पाते हैं यानी भारी बर्फ में भी अपनी गाड़ी को फिसलने नहीं देते।
किसी चुनौती का सामना करते समय क्या आप अपने दिमाग पर काबू रख पाते हैं, ताकि सही दिशा में सोच कर समाधान निकाला जा सके। या हालात के सामने हार मानकर आप पूरी तरह नकारात्मक सोच के आधीन हो जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि गुस्सा आना ही नहीं चाहिए, लेकिन उस समय आपका संतुलन और संयम ही आपकी विजय या पराजय निश्चित करता है। जीवन से तनाव कभी खत्म नहीं हो सकता, लेकिन उससे निबटने में समझदारी जरूर दिखाई जा सकती है। जब हम खुद को बेहतर बनाने के प्रयास छोड़ देते हैं तो हारने लगते हैं।
मेरे गुस्से ने मुझसे बहुत कुछ छीना है। अपना आपा खो कर मैंने खिड़कियां और कुर्सियां तोड़ी हैं। लोगों के साथ मार-पिटाई की है और अपने करीबियों को कड़वी बातें सुनाकर खूब रुलाया है। जिस वक्त मैं बड़ा हो रहा था, तब मानसिक सेहत को गंभीरता से नहीं लिया जाता था और मुझे भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इसलिए अपने गुस्सैल स्वभाव को मैंने निराशा समझ लिया और सोचा कि किसी से मदद मांगने से गुस्सा और बढ़ जाएगा। उस समय मैं खुद को बेहद कमजोर, असहाय और असफल इनसान समझता था और महसूस होता था कि मैं कभी अपने जीवन की गाड़ी पटरी पर नहीं ला पाऊंगा।
तब तक मुझे पता नहीं था कि मेरा गुस्सैल स्वभाव दरअसल डिप्रेशन और बाइपोलर डिसऑर्डर की वजह से था। मुझे पता ही नहीं था कि इसका समाधान क्या हो सकता है। उन तमाम उलझनों ने मुझे नशे का गुलाम बना दिया। लेकिन उससे मेरी मानसिक परेशानियां कम होने की बजाय और ज्यादा विकराल रूप लेने लगीं। जब मुझे अपने गुस्से की वजह पता चली तो जाने कितनी ही तरह की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं मेरे अंदर हलचल मचाने लगीं। क्योंकि अपने खराब व्यवहार के अहसास ने मेरे अंदर इतनी ग्लानि भर दी कि मुझे सामान्य होने के लिए सालों तक थेरेपी लेनी पड़ी।
अब मैं जिस तरह का आदमी हूं, ये बेहद नया-सा अहसास है। मुझे थेरेपी के दौरान समझ आया कि मेरी मानसिक परेशानियां मेरी गलती नहीं है, लेकिन उनका समाधान ढूंढ़ना मेरी ही जिम्मेदारी है।
यह ज्ञान भी मुझे पिता बनने के बाद ही आया कि अगर मेरी बेटी भी, मेरी पत्नी या मुझ जैसी ही बन गई तो संयम रखने की सीमा की परीक्षा जाने कितनी बार देनी पड़ेगी।
कठिन हालातों में शांत रहना आसान नहीं होता है, क्योंकि तब हमें मौके के अनुसार निर्णय लेने पड़ते हैं। यह कुछ-कुछ भारी बर्फ में गाड़ी चलाने जैसा ही है। क्योंकि तब ड्राइविंग स्कूल में सिखाए गए गाड़ी चलाने के गुर काम नहीं आते, बल्कि आपको अपनी समझ से ही गाड़ी को बर्फ पर फिसलने से रोक कर उस पर काबू पाना होता है। जब मुझे समझ आया कि गुस्सा असल में भावनाओं की काली बर्फ के समान ही होता है। हम अपने आपे से बाहर हो रहे हैं, यह समझने से पहले ही अकसर हम अपने क्रोध को हवा दे चुके होते हैं। तभी मुझे मुझे ध्यान लगा कर और अपने चेतन को जाग्रत करके अपने जीवन को सही दिशा देने का ज्ञान मिला।
क्रोध को दें सही दिशा
क्रोध कभी जाता नहीं है क्योंकि हम जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर इसका अनुभव करते हैं, लेकिन अपनी चेतना को जगा कर आप गुस्से के कारण और उसके प्रति अपनी प्रतिक्रिया के बीच दूरी अवश्य बना सकते हैं। ऐसा करने से आप विपरीत हालत में भी संयम से काम लेते हुए उस स्थिति से निबट सकते हैं।
क्रोध पर नियंत्रण रखना वर्तमान से खुद को अलग करके उस माहौल से दूर हटकर सोचने के समान है। कभी-कभी हमारे क्रोध का असल कारण वह होता ही नहीं है जो नजर आता है। जैसे कि अकसर पति-पत्नी के रिश्ते में तनाव की वजह कोई और होती है, लेकिन उसका गुस्सा पूरे रिश्ते की नींव हिला देता है। ऐसे में जरूरी होता है कि अपनी शादीशुदा जिंदगी को बचाने के लिए शांत दिमाग से अपने साथी से बात की जाए। हम सभी को समझने की जरूरत है कि कोई भी इनसान जन्म से ही खराब नहीं होता और मदद की गुंजाइश भी हमेशा बनी रहती है।
मेरे पिछले रिश्ते कड़वाहट के साथ इसलिए खत्म हुए क्योंकि मेरा अपने क्रोध पर काबू ही नहीं था और मैंने अपने गुस्से के सामने किसी भी तर्क को महत्व दिया ही नहीं। सिर्फ आवेश में आकर प्रतिक्रिया देते रहने से न केवल मेरे रिश्ते छलनी हो गए, बल्कि मेरे अंदर भी शर्म और ग्लानी भरती चली गई। मैंने खुद को बदलने का कभी प्रयास ही नहीं किया और बिना अपने आपको बदले किसी रिश्ते को बचाना असंभव है।
लेकिन थेरेपी ने अपनी भावनाएं समझने में मेरी बहुत मदद की। अब मैं स्वयं को एक बदला व्यक्ति महसूस करता हूं।
No comments:
Post a Comment