फिर चर्चा में वही इंडिया जो भारत है
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ब लोग पूछने लगे हैं, क्या देश का नाम बदल रहा है? असल में, लोकतंत्र में लोगों को ही यह ताकत हासिल है कि वे सहमति से अपने देश का नाम बदल सकते हैं। हालांकि, स्पष्ट रूप से नाम बदलने का कोई आधिकारिक विचार सामने नहीं आया है, पर हां, संविधान के तहत नाम बदला जा सकता है। नाम बदलने पर रोक नहीं है, इसके लिए संविधान संशोधन पर रोक नहीं है। देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने, जो राज्यसभा के सदस्य भी हैं, एक भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने यहां तक कहा था कि मूलभूत ढांचा नाम की कोई चीज संविधान में नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने यह बात प्रतिपादित की थी और इसे भी चुनौती दी जा सकती है।
व्यापक जनहित में अगर किसी चीज को रखना है या किसी चीज को हटाना है, तो यह बिल्कुल संभव है। आपातकाल के दौरान ही संविधान की प्रस्तावना में ‘सेकुलर’ और ‘सोशलिस्ट’ शब्द जोड़े गए थे। यह अलग सवाल है कि आज सरकार का क्या उद्देश्य है? यह जरूरी है भी या नहीं? मगर कोई भी जीवंत लोकतंत्र अपना भविष्य गढ़ने के लिए संविधान में बदलाव कर सकता है। मूल मकसद तो जन-कल्याण ही होना चाहिए, ताकि आम लोगों का समावेशी विकास हो। कानून किसी और मकसद से नहीं बनाए जाते हैं।
यह तो सभी लोग जानते हैं कि भारत शब्द हमेशा से रहा है। ‘मास’ या आम जन के लिए भारत और ‘क्लास’ अर्थात खास लोगों के लिए इंडिया शब्द मोटे तौर पर इस्तेमाल होता आया है। इंडिया शब्द संविधान में भी है, तो उससे किसी को परहेज नहीं है। दुनिया इंडिया को बड़े पैमाने पर जानती है, जबकि भारत शब्द देश में ज्यादा इस्तेमाल होता है। वैसे एक दर्जन से ज्यादा देश हैं, जिन्होंने अपने नाम बदले हैं, जैसे हाल के वर्षों में हॉलैंड ने अपना नाम नीदरलैंड कर लिया। news
सवाल यह है कि अभी का जो विवाद है, उसमें सरकार की ओर से कोई बात नहीं कही गई है। पार्टी के लोग अपनी-अपनी बात रख रहे हैं। केंद्र सरकार का रुख अभी तक नहीं पता है, आने वाले विशेष सत्र में शायद कोई बात सामने आए। माना जा रहा है कि बेंगलुरु में जो ‘इंडिया’ नामक का विपक्षी समूह बना, उसके बाद ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ कहने पर निश्चित रूप से विवाद उठना था। विपक्ष ने अपने लिए जो नाम चुना है और जिस तरह से जी-20 का निमंत्रण गया है, विवाद स्वाभाविक था। इस पर पक्ष-विपक्ष में राजनीति भी स्वाभाविक है। अब इस विवाद का जल्दी पटाक्षेप होता है या आगामी चुनाव तक यह विषय चलता रहेगा, कहना मुश्किल है। विशेष सत्र में इस पर क्या होगा या कुछ नहीं होगा, यह भी कहना मुश्किल है। शायद यह मुद्दा अगले किसी बड़े विषय तक चलता रहेगा।
ध्यान रहे, प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को लाल किले से एक बात कही थी, अनेक शब्द इस देश में गुलामी के प्रतीक हैं, जिनसे हम पूरी तरह से उबरे नहीं हैं। हालांकि, इसके बावजूद ऐसा नहीं है कि देश में नाम बदलने के लिए बड़ा अभियान चल गया हो। हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा भारत शब्द का इस्तेमाल विभिन्न स्तरों पर बढ़ाने की लग रही है और वह यह भी चाहते हैं कि इस विषय की जानकारी रखने वाले लोग ही इस विषय पर उचित बात रखें।
यह लोगों पर भी निर्भर करेगा कि इस विषय पर कब तक और कितनी चर्चा होती है। फिलहाल एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक पारित किया जाएगा? यह विषय तो नाम बदलने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह विधेयक यूपीए सरकार में ही राज्यसभा से पारित हो चुका था, पर लोकसभा में नहीं आ पाया, क्योंकि लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ने विरोध किया था, ये दोनों मनमोहन सिंह सरकार के समर्थक थे। भाजपा, कांग्रेस तब भी पक्ष में थी। सरकार चाहे, तो विशेष सत्र इसके लिए अच्छा मौका हो सकता है। देश में महिलाओं के सशक्तीकरण का यह बहुत बड़ा काम हो जाता।
बहरहाल, महिला आरक्षण पर अभी तो कोई चर्चा नहीं है। भारत बनाम इंडिया विवाद हावी हो गया है, पता नहीं, मूल मुद्दे उठेंगे या नेपथ्य में चले जाएंगे। यह बात किससे छिपी है कि न कांग्रेस को कभी भारत से परहेज रहा और न भाजपा ने कभी इंडिया शब्द छोड़ा है। वर्तमान सरकार के समय ही न जाने कितनी योजनाओं और अभियानों के नाम के साथ इंडिया शब्द जुड़ा हुआ है, जैसे ‘खेलो इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया’ इत्यादि। इंडिया के प्रति भाजपा का यह रुख कभी नहीं रहा कि इस शब्द से निजात पाने के लिए कोई प्रयास किए जाएं। वैसे, यह मांग पुरानी है।
ध्यान रहे, मुलायम सिंह यादव जब मुख्यमंत्री थे, तब उत्तर प्रदेश की विधानसभा में बाकायदा एक प्रस्ताव पारित हुआ था, देश के नाम से इंडिया को हटाकर भारत किया जाएगा। हालांकि, यह अधिकार राज्य सरकार को नहीं है, लेकिन मुलायम सिंह यादव तब हिंदी को लेकर बहुत सक्रिय थे।
दरअसल, केंद्र सरकार को ज्यादा स्पष्टता के साथ विवाद का पटाक्षेप करना चाहिए। लोगों को बेवजह चर्चा का मौका क्यों दिया जाए? एक और बात गौर करने की है कि जब संविधान का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया गया, तब इंडिया की जगह भारत शब्द का इस्तेमाल हर जगह किया गया। तमिल हो या माराठी, हर जगह पहले भारत और बाद में इंडिया आता है। भारत शब्द कहीं से भी उपेक्षित नहीं है।
अफसोस, बहुत से लोग हैं, जो नाम की राजनीति का लाभ लेना चाहते हैं, यह प्रशंसनीय नहीं है। इंतजार करना चाहिए। अभी केवल एक निमंत्रण पत्र पर भारत लिख देने भर से किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाना चाहिए। न कोई इंडिया को हटाने की बात कर रहा है और न कोई भारत को छोड़ने की चर्चा कर रहा है। नाम के फेर में काम की बातें नजरंदाज नहीं होनी चाहिए और इस वक्त देश में काम की बहुत बातें हैं। यह बात भी देखने की है कि अगर चुनाव न होता, तो यह मुद्दा भी नहीं होता और विपक्ष भी इतना मुखर न होता।
फिलहाल, विवाद का असर है कि इंडिया में रहने वाला भारत से और भारत में रहने वाला इंडिया से और ज्यादा परिचित हो रहा है। समय बदल रहा है। कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का नाटक है बकरी, जिसमें संवाद है,‘हम देश में नहीं रहित हुजूर गांव में रहित है’। जिस महिला पात्र ने यह कहा था, शायद वह भी अब देश में रहने लगी है, देश का नाम अच्छे से जानने लगी है। शायद हर बहस से देश कुछ सीखता है।
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