
जी-20 की बैठक में शिरकत करने भारत आ रहे मेहमानों के सम्मान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने रात्रिभोज का आयोजन किया है, जिसके निमंत्रण पत्र पर पहली बार अंग्रेजी में ‘रिपब्लिक ऑफ इंडिया’ की जगह ‘रिपब्लिक ऑफ भारत’ के इस्तेमाल को लेकर मुख्यधारा के मीडिया से सोशल मीडिया तक प्रतिक्रियाओं की बाढ़-सी आ गई है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि एक नागरिक के तौर पर देश के नाम से उसके बाशिंदों का भावनात्मक रिश्ता होता है। इसका अंदाजा इसी तथ्य से लग जाता है कि सरकार ने अभी औपचारिक रूप से ऐसा कोई प्रस्ताव पेश भी नहीं किया है, जो ‘इंडिया’ के इस्तेमाल को रोकता हो, मगर लोग दो खेमों में बंटते साफ दिख रहे हैं। दरअसल, राष्ट्रपति भवन से हुई इस पहल के बाद ऐसा संदेश गया है कि यही सरकार की ठोस मंशा है। आरएसएस प्रमुख ने हाल ही में इंडिया की जगह भारत के इस्तेमाल की पैरोकारी की थी। मगर सवाल उठता है कि ऐसे किसी विमर्श को खड़ा करने के लिए क्या यह मुनासिब वक्त है? देश में जी-20 के शासनाध्यक्ष आने को हैं। इस समय तो एक मानस के साथ हमें वसुधैव कुटुंबकम् की अपनी पहचान का उनसे लोहा मनवाना था?
भारत का संविधान जब लिखा जा रहा था, तब इस बात पर गंभीर बहस हुई थी कि क्या देश का एक ही नाम हो, अंतत ‘इंडिया दैट इज भारत’ का इस्तेमाल करते हुए इस विमर्श का समाधान किया गया। आजाद भारत के मानस में आर्यावर्त, हिन्दुस्तान, भारत और इंडिया समान रूप से समादृत रहा है। स्वतंत्रता के बाद से साढ़े सात दशक का सफर तय कर चुका भारत न सिर्फ एक प्रौढ़-परिपक्व लोकतंत्र के रूप में, बल्कि तरक्की के दीगर मेयार पर आज दुनिया की पहली कतार में खड़ा है। इसे कभी उज्र नहीं हुआ कि इसे इंडिया नाम से पुकारा गया या भारत या हिन्दुस्तान। ऐसे में, जब आधिकारिक रूप से ऐसा कोई प्रस्ताव आएगा, तब पूछा ही जाएगा कि क्या इन नामों की वजह से कोई प्रशासनिक परेशानी खड़ी हो रही है? और अगर ऐसा है, तो क्या यह बेहतर नहीं होगा कि इसके बारे में अंतिम निर्णय व्यापक जन-सहमति से हो?
हमारा देश, समाज और इसकी रवायतें अपनी समूची खूबसूरती ही विविधताओं से बटोरती हैं। आज हम कृष्ण जन्माष्टमी की तैयारी कर रहे हैं, तो याद कीजिए भगवान के कितने नाम हैं? दरअसल, हमारे देश की पूरी राजनीति प्रतीकों की जंग में तब्दील होती जा रही है। कोई सियासी जमात अपना नाम ऐसा रख लेता है, जिसका संक्षिप्त ‘इंडिया’ हो जाए और लोग उसके आकर्षण में महंगाई, बेरोजगारी, खेती-किसानी से जुडे़ कार्यक्रमों के बारे में उससे सवाल पूछना भूल जाएं, तो उसके विरोधी संगठन के लोग इसका राजनीतिक तोड़ ढूंढ़ने के बजाय नाम ही बदल देने पर आमादा दिखते हैं। मगर दोनों ध्रुवों पर खड़ी सियासी पार्टियां यह भूल रही हैं कि भारतीय मतदाता अब बेहद परिपक्व हो चला है और वह उनकी मंशा को बखूबी समझता है। इसलिए वे इस भ्रमजाल से जितनी जल्दी बाहर निकल आएं, उतना ही उनके लिए फायदेमंद होगा। मणिपुर, सरहदों की सुरक्षा से लेकर गरीबी और बेरोजगारी जैसे कितने ही गंभीर सवाल सामने हैं, उन्हें सुलझाने के लिए देश को गंभीर समावेशी राजनीति की जरूरत है। दुर्योग से देश में सर्वानुमति बनाने की राजनीति क्षीण पड़ चुकी है और यह भारत जैसे विशाल व विविधताओं से भरे लोकतंत्र के लिए उचित नहीं। इसे सभी पक्षों को समझना होगा।
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