#Help_Them कहै कबीर पुकार के, दोय बात लख लेय।
एक साहेब की बंदगी, व भूखों को कुछ देय।।
हे मानव! मैं आवाज लगाकर ऊँचे स्वर से कह रहा हूँ कि मानव शरीर प्राप्त करके दो बातों पर ध्यान दें। एक तो परमात्मा की भक्ति कर दूसरी बात है कि भूखों को भोजन अवश्य कराना चाहिए। यह मानव का परम धर्म है। #Help_Them
परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि जब कोई व्यक्ति क्रोधवश आप जी को गाली।देता है तो वह एक गाली देकर चुप हो जाता है। यदि आप जी ने उलट कर गाली दे दी तो वह तो तैयार है लड़ने के लिए, वह आपको अनेकों गालियाँ देगा। कबीर
जी कहते हैं मेरी राय है कि आप प्रतिउत्तर में गाली न देना, वह एक की एक ही रह जाएगी। बात आगे नहीं बढ़ेगी
अ गाली-गलौच से ही कलह अर्थात् झगड़े का जन्म होता है।
गाली ही से आत्मा को कष्ट होता है। गाली ही से झगड़ा बढ़ जाने से मृत्यु तक संभव है। यदि गाली देने वाले का उत्तर गाली से न देकर अपने आपको हारा यानि पराजित मान लेता है, वह संत है। यदि अन्य झगड़ालु की तरह झगड़ा करके मर-मिटता
है तो वह नीच व्यक्ति है। कबीर जी ने कहा है कि हरिजन अर्थात् परमात्मा का भक्त तो हारा ही अच्छा है क्योंकि भक्त प्रतिष्ठावश गलत कार्य नहीं करते। संसारी व्यक्ति आध्यात्म ज्ञान
से अपरीचित होने से मान-बड़ाई अर्थात् प्रतिष्ठावश अपना और सामने वाले का नाश करने पर तुल जाता है। ऐसे में परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि ऐसे महिमा के भूखे संसारी व्यक्ति को अपनी जीत का जश्न मनाने दे। वह तो काल के मुँह में जाएगा और भक्त जो हारकर झगड़ा न करके चला गया, वह भक्ति
करके परमात्मा के पास सत्यलोक में चला जाएगा। कबीर जी ने परम भक्त की स्थिति बताई है और जन साधारण का स्वभाव
बताया है। कहा है कि जितने घट अर्थात् मानव शरीरधारी व्यक्ति हैं, सबका भिन्न-भिन्न स्वभाव तथा विचारधारा है। जिस भक्त के लिए जीत तथा हार कोई महत्व नहीं रखती, उसमें ब्रह्म अर्थात् परमात्मा का प्यार समाया है। वह भक्त संसार से भिन्न स्वभाव का है।