हमारी सबसे बड़ी योग्यता है एक अच्छा इंसान बनना
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मुझे इस लेख को लिखते वक्त स्वामी विवेकानंद की बातें याद आ रही हैं कि जीवन का दर्शन सिर्फ और सिर्फ अच्छा करो और अच्छा बनो है। पिछले दिनों भारत के प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ बेंगलुरु के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के 31वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे और किसी ने यह नहीं सोचा था कि वह कानूनी योग्यता से ज्यादा इंसानियत का पाठ याद दिलाएंगे। उन्होंने इशारा किया कि एक
अच्छा इंसान होना और एक अच्छा वकील होना बराबर नहीं है। यदि आप कभी खुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं, जब एक को दूसरे की कीमत चुकानी पड़े, तो मैं आपसे सबसे पहले अच्छा इंसान बनने का आग्रह करूंगा।
वैसे इस युग में पहली और अंतिम प्राथमिकता योग्य बनने की है। अच्छा बनकर रहना व्यक्तित्व की कमजोरी मानी जा रही है। अच्छे व्यक्ति को अक्सर हल्के में लिया जाता है, ‘इमोशनल फूल’ माना जाता है। स्वभाव की उद्दंडता जायज हो गई है, शर्त यह है कि वह बेशर्मी या उद्दंडता पैसा, नौकरी या व्यापार से लैस हो। समरथ को नहीं दोष गोसाईं। जी हां, गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा के दौर में जहां हर परिवार, हर संस्था योग्यता को सर्वोच्च जरूरत मानती है, ऐसे में, अच्छा बनने की वकालत करना सुखद है। ऐसे ही विमर्श में प्लेटो, अरस्तू, सुकरात, कांट, रॉल्स, गांधी, विवेकानंद जैसे दार्शनिक भी लगे रहे। प्रारंभिक यूनानी दार्शनिक हमेशा दो प्रश्नों का उत्तर देने में रुचि रखते थे दुनिया क्या है? अच्छा कौन है? जोसेफ सीफर्ट अपने लेख, मोरल गुडनेस अलोन इज गुड विदाउट क्वालिफिकेशन में कांट को उद्धृत करते हुए कहते हैं, नैतिक मूल्यों को किसी योग्यता की जरूरत नहीं होती। अच्छाई का नैतिक मूल्य अपने आप में संपूर्ण योग्यता है। प्लेटो ने अच्छाई की तुलना सूर्य के साथ की है, क्योंकि इसी के द्वारा हमें चीजों को सही रूप में देखने की योग्यता मिलती है। महाभारत में भी कहा गया है, ‘जब न कोई राज्य था, न कोई राजा, न शासन था, न राज्यपाल, तब प्रजा की रक्षा धर्म द्वारा की जाती थी। यह धर्म अच्छाई है, यह सभी के लिए है।’
अत अगर हम सुशासन और कानून के राज की बात करें, तो पाएंगे कानून का राज और सुशासन, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सुशासन तभी संभव है, जब समाज में स्वाभाविक रूप से अच्छाई हो। अगर शिक्षक अच्छा इंसान नहीं है, तो शिक्षा प्रदूषित हो जाती है और समाज बंट जाता है। अगर डॉक्टर अच्छा इंसान नहीं है, तो मरीज अमीर और गरीब में बंट जाते हैं। नागरिक अगर अच्छाई पर विश्वास करते हैं, तो कानून का शासन स्वत संभव हो जाता है।
‘वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट’ के ‘रूल ऑफ लॉ इंडेक्स’ से यह बात निकलकर आई है कि 113 देशों में से पांच देश ऐसे हैं, जिनके नागरिकों ने बिना किसी पूर्वाग्रह के एक खुश और अच्छे नागरिक की तरह कानून की पालना की है। इन देशों में यह पाया गया कि ऐसे अच्छे व्यवहार के पीछे कुछ खास कारण हैं, जैसे भ्रष्टाचार मुक्त समाज, अनुशासन व सुरक्षा, नागरिक और न्यायिक अधिकार इत्यादि। जहां सिंगापुर और न्यूजीलैंड भ्रष्टाचार मुक्त देश हैं, तो वहीं नीदरलैंड, स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क और नॉर्वे इन मानकों में अव्वल पाए गए हैं।
दरअसल, अच्छाई का शासन कानून के राज से कहीं ज्यादा जरूरी है। सोचना चाहिए, नॉर्डिक देश वर्षों से शिक्षा, हैप्पीनेस इंडेक्स, लोक-कल्याणकारी राज्य की संकल्पना में सबसे आगे क्यों हैं? इसी संदर्भ में हमें यह भी देखना जरूरी है कि एक अच्छा नागरिक ही एक अच्छा यात्री भी होता है। वह उन्हीं देशों की यात्रा करना चाहता है, जहां अच्छाई या नैतिकता की पहचान होती है। एक लैटिन अमेरिकी कंपनी के सर्वे के अनुसार, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, आइसलैंड आदि देश इस मानक पर खरे उतरते हैं। वर्ल्ड हप्पीनेस रिपोर्ट के संपादक प्रोफेसर हेलवेल कहते हैं, नॉर्डिक देश अगर वास्तव में शीर्ष पर हैं, तो विश्वास और परोपकार के कारण हैं।
यहां वायकॉम बशीर की याद स्वाभाविक है, जिन्हें ‘फिलॉस्फर ऑफ गुडनेस’ भी कहा जाता है। बशीर ने कहा है, ‘गुडनेस का अर्थ है, सूखे पौधे को देखकर पानी डालने की इच्छा हो जाए या किसी भूखे को खाना खिलाने का मन कर जाए।’
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