

दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स की बैठक से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अनौपचारिक बातचीत के गहरे अर्थ हैं। साल 2020 की गलवान झड़प से पहले दोनों देशों के रिश्ते ठीक-ठाक ही थे। कुछ सीमावर्ती इलाकों में चीन द्वारा स्थायी निर्माण-कार्य के कारण थोड़ा तनाव जरूर था, लेकिन दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की आपसी मुलाकात होती रहती थी। मगर गलवान की घटना के बाद अविश्वास का माहौल बना, जिसकी वजह से इस तरह की बैठकें बंद हो गईं और मुख्यत सैन्य स्तर पर यथास्थिति बहाल करने के प्रयास होने लगे। यही कारण था कि ब्रिक्स की बैठक के शुरू होने से पहले तक यह तय नहीं था कि दोनों नेता आपस में मिलेंगे!
इससे पहले पिछले साल जी-20 की बाली बैठक में भी प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग की मुलाकात हुई थी। मगर उम्मीद के मुताबिक उसका उतना असर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर नहीं दिखा था। यहां तक कि उस मुलाकात के बाद दोनों देशों के मीडिया से जो सूचनाएं साझा की गईं, वे भी मेल नहीं खा रही थीं। हालांकि, बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार या विदेश मंत्री के स्तर पर जो वार्ताएं हुईं, उनसे यह एहसास हुआ कि दोनों देश विश्वास बहाली और सेना को अपने-अपने शिविरों में वापस लौटाने को लेकर गंभीर हैं। चूंकि उस बैठक के बाद नाममात्र सुधार दिखा था, इसीलिए यह उम्मीद की जा रही है कि ताजा बैठक के बाद उसमें कुछ तेजी आ सकती है। विशेषकर अगले महीने जी-20 के सम्मेलन में भाग लेने के लिए शी जिनपिंग दिल्ली आने वाले हैं, इसलिए माना जा रहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कुछ ठोस देखने को मिल सकता है। हालांकि, चीन का रुख कितना नरम पड़ा है, यह परखने के लिए हमारे पास वक्त काफी कम है।
एक दिक्कत यह भी है कि चीन के नेता अपनी सेना के साथ एकतरफा संवाद रखते हैं। वहां की सेना को इतनी भी आजादी हासिल नहीं कि वह किसी कार्रवाई की रिपोर्ट अपने तईं भेज सके। उसे बस ऊपर से मिले आदेश का पालन करना होता है। इसलिए अगर मोदी-जिनपिंग बातचीत के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के सैनिकों का व्यवहार बदलता है, तभी यह माना जाएगा कि उसे अपने शीर्ष नेता से कुछ संकेत मिले हैं, अन्यथा इस मुलाकात को रस्मी मानकर ही संतोष करना होगा। हालांकि, जिस तरह की वैश्विक परिस्थितियां हैं, उनमें ऐसी मुलाकात की जरूरत दोनों देशों को थी। कोशिश यही की गई होगी कि जिन-जिन क्षेत्रों को लेकर सहमति बन चुकी है, वहां यथास्थिति जल्द बहाल की जाए और डेमचौक-डेप्सांग जैसे इलाकों में, जहां दोनों देशों में सहमति नहीं बनी है, वहां अधिकारीगण आगे की रूपरेखा तय करें।
द्विपक्षीय संबंध को सामान्य बनाना बहुत जरूरी है, लेकिन इसके लिए भारत अब कोई कीमत चुकाने को तैयार नहीं है। अमूमन चीन के नेता सीमा विवाद को किनारे करके बाकी क्षेत्रों में संबंध आगे बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं। यही कारण है कि चीन हमारा बड़ा कारोबारी साझेदार बन चुका है और व्यापार संतुलन भी उसी के पक्ष में है। यहां तक कि जितना हमारा रक्षा बजट (करीब 67 अरब डॉलर) है, करीब-करीब उतना ही चीन के साथ हमारा व्यापारा घाटा (करीब 69 अरब डॉलर) है। यह इसलिए हुआ, क्योंकि 2020 से पहले हमने चीन के साथ कदम मिलाने की नीति ही अपना रखी थी। मगर अब तस्वीर बदल चुकी है। फिर, हमारी सरकार पर संबंध सामान्य बनाने का कोई जन-दबाव भी नहीं है, बल्कि ऐसा कुछ करने की अतिरिक्त कोशिश आम लोगों की नजरों में सरकार की छवि बिगाड़ सकती है। लिहाजा, बहुपक्षीय मंचों पर भारत की तरफ से परिस्थितिवश उदारता जरूर दिखाई जा रही है, मगर द्विपक्षीय बैठकों में हमारा सख्त रुख बरकरार है। हम नहीं चाहते कि अब चीन को एकतरफा फायदा मिले।
इस मुलाकात का एक पहलू निस्संदेह अगले महीने भारत में होने वाली जी-20 की शिखर बैठक भी है। मोदी सरकार का स्पष्ट मानना है कि इस बैठक में जिन-जिन देशों के शासनाध्यक्ष आएं, उनके साथ सकारात्मक माहौल में बातचीत हो। बेशक कई मामलों में चीन हमसे बेहतर है, लेकिन अब वह हम पर दबाव नहीं बना सकता। आपसी संबंध को सामान्य बनाने के लिए उसे ही कुछ झुकना होगा। ब्रिक्स बैठक में जो फैसले लिए गए हैं, और जी-20 की अध्यक्षता से भारत की जो हैसियत बढ़ी है, उसे चीन नजरंदाज नहीं कर सकता। भारत अब वैश्विक दक्षिण की एक समर्थ आवाज बन चुका है। तमाम देशों के साथ हमारे संबंध काफी बेहतर हुए हैं। ऐसे में, बीजिंग अपनी विस्तारवादी नीतियों या सैन्य दबाव का दांव हम पर नहीं आजमा सकता। वह अब कहीं भी हमें पूरी तरह से किनारे नहीं कर सकता।
आम धारणा यही है कि चीन एशिया महाद्वीप में अपना प्रभुत्व बनाना चाहता है। इसके लिए वह कई मोर्चों पर काम कर रहा है। इसमें उसका सबसे प्रभावी हथियार है, कर्ज देकर दूसरे देश को अपनी शर्तों के अधीन करना। भारत उसकी इस रणनीति से अवगत है, और वक्त-वक्त पर हम उसे उचित जवाब भी दे रहे हैं। गलवान से पहले तक तो चीन यही मानता था कि सीमावर्ती इलाकों में वह जो भी निर्माण-कार्य करेगा, भारत उस पर चुप्पी साधे रहेगा। मगर नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया कि यह 1960 का दशक नहीं है। इसीलिए भी सीमा पर तनातनी बनी हुई है, क्योंकि भारत अपनी जगह छोड़ने को कतई तैयार नहीं है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं कि हम तनाव बनाए रखना चाहते हैं। हमारी कोशिश यही है कि बातचीत से इस मसले का समाधान हो।
यही कारण है कि अनौपचारिक ही सही, हमारे प्रधानमंत्री ने चीन के शासनाध्यक्ष से मुलाकात की। मगर चीन की मानसिकता में कितना बदलाव आया है, इसका पता सीमावर्ती इलाकों की स्थिति से ही चलेगा। एक सच्चाई यह भी है कि पिछले 10 महीने से चीन के राजदूत भारत में नहीं बैठ रहे। यह आपसी संबंधों का एक नकारात्मक पहलू है। प्रधानमंत्री मोदी ने जिनपिंग से मुलाकात करके यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि हम संबंधों को आगे बढ़ाने के पक्षधर हैं। मगर इसके लिए पहल अंतत चीन को ही करनी होगी। तभी वास्तविक नियंत्रण रेखा का भी समाधान निकल सकेगा।
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