चुनावी तारीखों के इंतजार में कश्मीर
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आज की ताजा खबर जम्मू-कश्मीर में चुनाव की चर्चा तेज हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने संबंधी बयान के बाद यहां के राजनीतिक दलों के नेताओं व लोगों को लगने लगा है कि सरकार इस बार विधानसभा चुनाव कराने को लेकर गंभीर है। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में नौ साल पहले 2014 में विधानसभा के चुनाव हुए थे, उसका कार्यकाल खत्म होने से पहले ही 22 नवंबर, 2018 को तत्कालीन राज्यपाल सतपाल मलिक ने विधानसभा को भंग कर दिया था और तब से यहां राज्यपाल या उप-राज्यपाल का शासन चल रहा है।
हालांकि, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनावों को लेकर तो इरादा जता दिया है, मगर यहां के राजनेता, बुद्धिजीवी और पत्रकार मानते हैं कि केंद्र सरकार इस तरह के बयान पिछले दो वर्षों में अलग-अलग मंचों पर दे चुकी है। यहां भाजपा भी अपने कार्यकर्ताओं को यह विश्वास नहीं दिला पा रही है कि आखिर चुनाव कब होंगे? स्थानीय स्तर पर अगर देखें, तो भाजपा, नेशनल कांफ्रेंस, कांग्रेस, पीडीपी और अन्य दल पिछले कई महीनों से चुनावी मुद्रा में हैं।
कश्मीर के बुद्धिजीवियों और विद्वानों का मानना है कि केंद्र सरकार 2024 के आम चुनाव से पहले जम्मू-कश्मीर में चुनाव नहीं कराएगी और यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार ने किसी महीने या तारीख के बारे में कोई प्रतिबद्धता जाहिर नहीं की है। शायद केंद्र सरकार जल्दबाजी में चुनाव इसलिए नहीं करवा रही, क्योंकि उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा पहले भ्रष्टाचार और आतंकवाद से मुक्त केंद्र शासित प्रदेश के निर्माण में लगे हैं। विकास अगर एक बार पटरी पर चल पड़ेगा, तो शांतिपूर्ण चुनाव में कामयाबी मिलेगी और दुनिया में उसका संदेश भी अच्छा जाएगा।
सरकार का मानना है कि कानून-व्यवस्था में बहुत हद तक सुधार आई है। कश्मीर में पत्थरबाजी और हड़ताल की घटनाएं पिछले पांच साल में शून्य हो गई हैं। सुरक्षा बलेां की शहादत और हत्या-हिंसा में भी काफी कमी आई है। आमतौर पर एक बड़ा तबका केंद्र सरकार व स्थानीय प्रशासन से काफी खुश है, क्योंकि यहां इन दिनों काफी विकास कार्य हो रहे हैं, जो पिछले सात दशक में नहीं हुए थे। लोग इसलिए भी खुश हैं कि कश्मीर में पहले जैसा खून-खराबा खत्म हो गया है, जिसमें ज्यादातर आम लोग ही पिसते थे। पर्यटकों की आमद बढ़ती ही जा रही है, जिससे रोजगार के मौके बहाल हुए हैं। हड़ताल और पत्थरबाजी की वारदात खत्म होने से भी लोगों को बड़ा सुकून मिला है। स्कूल, कॉलेज पूरे खुल रहे हैं, खेल गतिविधियां भी बढ़ी हैं। अब यहां के बच्चे पुरस्कार जीत रहे हैं। यहां बहुत कुछ ऐसा अच्छा हो रहा है, जो 33 साल के आतंकवाद और अलगाववाद के दौर में मुमकिन नहीं था।
वैसे, यहां एक तबका खुश नहीं है। उसका कहना है कि जम्मू-कश्मीर में 2018 में विधानसभा के भंग होने के बाद और 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 और 35ए के खत्म होने के बाद ‘डेमोक्रेसी’ बिल्कुल नहीं है। जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के उप-प्रधान और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि उनकी पार्टी केंद्र से चुनाव की भीख नहीं मांगेगी। उनका कहना है कि सरकार विधानसभा के चुनाव कराने में क्यों डर रही है? जब उसका दावा है कि यहां कानून-व्यवस्था बिल्कुल ठीक है, तब संसदीय चुनावों के साथ विधानसभा के चुनाव करा देने चाहिए, जिससे दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जाएगा। वैसे, राजनीतिक दलों की ओर से दी जा रही यह दलील जम्मू-कश्मीर में नई नहीं है।
तय है, यहां चुनाव जब भी होंगे, बहुत दिलचस्प होंगे, क्योंकि इस बार के चुनाव अलगाववादी नेताओं और आतंकवादियों के दखल के बिना होंगे। राजनीतिक विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस बार के चुनाव में हुर्रियत कांफ्रेंस, उसके नेताओं और उनके संगठनों का नामो-निशान नहीं होगा। सब जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर में पिछले पांच साल में काफी बदलाव आया है, पर अभी तक कोई भी राजनीतिक पार्टी जमात के वोट को अपनी तरफ नहीं खींच पाई है। साल 1977 में जब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई श्रीनगर में अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारूक के पिता मौलाना फारूक के घर गए थे और वहां सभी तत्कालीन अलगाववादी नेताओं से मिलकर उनको विश्वास दिलाया था कि जम्मू-कश्मीर में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाएंगे। इस दौरान कई अलगाववादी नेता जनता पार्टी में शामिल हो गए थे और चुनाव लड़कर कामयाब भी हुए थे। ऐसे नेताओं में सईद अली शाह गिलानी भी शामिल थे। अभी भी कश्मीर में पुराने लोग याद करते हैं कि साल 1977 के विधानसभा चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हुए थे।
उसके बाद भी प्रयास तो हुए, पर एक तबका है, जिसे मुख्यधारा की राजनीति में लाने का काम बचा हुआ है। क्या आगामी चुनाव में यह काम मुमकिन हो सकेगा? जमात के वोट मुख्यधारा के दलों को हासिल हो सकेंगे? जमात के वोट को अभी तक न तो अल्ताफ बुखारी समेट पाए हैं और न सज्जाद लोन। यहां ज्यादातर जानकारों का मानना है कि इस बार पहले के मुकाबले में चुनाव स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा आधारित रहेंगे। लोग स्थानीय दलों को ज्यादा वोट देंगे।
बहरहाल, आम लोग भी मानते हैं कि चुनावों को ज्यादा टालना ठीक नहीं है और चुनाव के लिए राजनीतिक दल भी तैयार हैं। देखना है, क्या गुलाम नबी आजाद की आजाद पार्टी कुछ खास मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित कर पाएगी? क्या कश्मीर में भी नए विपक्षी गठबंधन- इंडिया -का कोई स्वरूप उभरेगा? भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं को मतदान केंद्र के स्तर पर प्रशिक्षण देने का काम शुरू कर दिया है। अब सबको चुनावी तारीख का इंतजार है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों की घोषणा से पहले केंद्रशासित प्रदेश को पूरी तरह से राज्य का दर्जा देने की घोषणा इस माह संसद के विशेष सत्र में भी हो सकती है। यह भी एक ऐसी घोषणा होगी, जिसका इंतजार चल रहा है। दूसरी ओर, पीडीपी जैसी पार्टी अभी भी अनुच्छेद 370 और 35ए की बहाली के इंतजार में है। वैसे ज्यादातर कश्मीरी मानते हैं कि यह समय पीछे नहीं, बल्कि आगे देखने का है, और इसी में तरक्कीपसंद कश्मीर का मुस्तकबिल भी है।










