
अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थित एक प्रयोगशाला में परमाणु फ्यूजन को साकार किया जा रहा है।


कैंसर नाशक दवा की खोज में दिलोजान से लगी वैज्ञानिक लिंडा मल्कास, सिटी ऑफ होप के आणविक निदान और प्रयोगात्मक चिकित्सा विज्ञान विभाग में प्रोफेसर हैं।


इंसानों को अपना धन कहां ज्यादा लगाना चाहिए?
बेशक हमें विज्ञान पर ज्यादा धन खर्च करना चाहिए। 2014 और 2018 के बीच दुनिया भर में विज्ञान पर खर्च (+19) बढ़ा था, साथ ही वैज्ञानिकों की संख्या (+13.7) भी बढ़ी थी। यूनेस्को की नई विज्ञान रिपोर्ट, द रेस अगेंस्ट टाइम फॉर स्मार्टर डेवलपमेंट के अनुसार, इस प्रवृत्ति को कोविड संकट से और बढ़ावा मिला है। हालांकि, केवल दो देश, अमेरिका और चीन के नाम इस वृद्धि (63) का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हैं, जबकि पांच में से चार देश बहुत पीछे हैं।
देश और दुनिया में कहां होता है फिजूल खर्च?
साल 2014 के आंकड़े को देखें, तो दुनिया में लगभग 53 अरब डॉलर रुपये आतंकवाद की भेंट चढ़े थे। इससे भी अधिक धन दुनिया में हर साल युद्ध के नाम पर खर्च कर दिया जाता है। हर साल हजारों लोग युद्ध और आतंकी हमलों में मारे जाते हैं। उनके इलाज, भरपाई, मुआवजा में बहुत राशि दुनिया के अनेक देश खर्च करते हैं। जान-माल की भारी तबाही के बावजूद आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले और आतंकवाद के प्रति आंख मूंदे रहने वाले लोग और देश दुनिया में कम नहीं हैं।
परमाणु रिएक्टर अभी दुनिया में सक्रिय हैं, जो कुल उत्पादित विद्युत का मात्र 10 प्रतिशत पैदा कर पाते हैं।
440+
पूरी दुनिया में चुनौती बनतेजा रहे रोग से युद्ध
सेल कैमिकल बायोलॉजी नामक पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में प्रोफेसर लिंडा मल्कास ने दावा किया है कि प्री-क्लिनिकल अध्ययनों में, एओएच1996 स्तन, प्रोस्टेट, डिम्बग्रंथि, गर्भाशय ग्रीवा, त्वचा, मस्तिष्क और फेफड़ों के कैंसर के खिलाफ प्रभावी रहा है। एओएच1996 कोशिका और पशु मॉडल में मोनोथेरेपी या संयोजन उपचार के रूप में विषाक्तता के बिना टॺूमर के विकास को दबा सकता है। इस खोज ने निश्चित रूप से दुनिया भर के हजारों कैंसर रोगियों और उनके परिवारों को आशा नई किरण दी है। चिकित्सक भी यह मान रहे हैं कि इस दवा का विकास दुनिया में सुख और शांति की एक बड़ी वजह बन सकता है।
मंजिल पर पहुंचने लगी स्वच्छ ऊर्जा की खोज
पृथ्वी और पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा की खोज दुनिया में निरंतर जारी है, इसी कड़ी में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता हाथ लगी है।
जब नई खोज - परमाणु फ्यूजन की बात आती है, यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा दो हल्के परमाणु एक साथ जुड़कर एक भारी परमाणु बनाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बहुत ऊर्जा निकलती है। परमाणु फ्यूजन किसी भी प्रकार की ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं करता है। यह कोई रेडियोधर्मी अपशिष्ट भी नहीं छोड़ता है और बहुत कम ईंधन से बहुत अधिक ऊर्जा पैदा करता है।
ऊर्जा की बर्बादी को रोकने का प्रबंध बहुत जरूरी हो गया
दक्षिण कोरियाई शोधकर्ताओं ने एक ऐसी सामग्री विकसित की है, जो कमरे के तापमान और परिवेश के दबाव पर अतिचालकता प्रदर्शित करती है। इसका ऊर्जा संचालन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। दुनिया ट्रांसमिशन लाइनों के निर्माण के लिए तांबे और एल्यूमीनियम का उपयोग करती है, पर परिवेश के तापमान पर वे बिजली के प्रति प्रतिरोध दिखाते हैं। इसके चलते ट्रांसमिशन और वितरण (टीएंडडी) हानि होती है। अकेले अमेरिका में हर साल टीएंडडी घाटे में 100 अरब यूनिट बिजली बर्बाद हो जाती है।
एक अच्छी दुनिया और उसकी संभावनाओं की कल्पना कीजिए। कोई हमें हरित और सुरक्षित ऊर्जा का असीमित स्रोत प्रदान कर सकता है। दूसरा, ट्रांसमिशन और वितरण घाटे को बड़े पैमाने पर कम करते हुए बिजली ग्रिड को चाक-चौबंद बनाकर दुनिया को लाभ पहुंचा सकता है। चिकित्सा क्षेत्र में, दो खोजों में से पहली खोज दुनिया को मनुष्यों के लिए ज्ञात सबसे डरावनी बीमारियों में से एक - कैंसर का प्रभावी इलाज दे सकती है। चौथी खोज, अल्जाइमर को नियंत्रित करने से संबंधित है। यह एक ऐसी बीमारी है, जो मनुष्य की संज्ञान क्षमता और कार्य क्षमता को धीमा कर देती है। अभी इसका कोई पुख्ता इलाज नहीं है।
ये सभी खोजें चुनौतियां लेकर आती हैं। इन प्रयोगों को बार-बार दोहराने और कसौटी पर खरा उतारने की जरूरत है। चिकित्सा खोजों के मामले में देखें, तो इन प्रयोगों को नैदानिक परीक्षणों को पार करना होता है, ताकि ये जो लाभ देते हैं, वह उनके दुष्प्रभावों से कहीं अधिक हो। वैसे, वैज्ञानिक समुदाय बहुत उत्साहित नजर आ रहा है। वैज्ञानिकों ने इन दावों को बारीकी से देखना शुरू कर दिया है। कुछ लोग सफलता पाने में असफल हो सकते हैं, लेकिन जैसा कि अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, असफलता प्रगति में सफलता है।
परमाणु फ्यूजन - सुरक्षित ऊर्जा
30 जुलाई को कैलिफोर्निया के लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी में स्थित नेशनल इग्निशन फैसिलिटी के शोधकर्ताओं ने घोषणा की कि उन्होंने परमाणु मिश्रण या संलयन या फ्यूजन क्रिया में शुद्ध ऊर्जा लाभ हासिल किया है। दूसरे शब्दों में कहें, तो वैज्ञानिक खपत से अधिक ऊर्जा पैदा करने में कामयाब रहे हैं। वाणिज्यिक फ्यूजन ऊर्जा को संभव बनाने के लिए शुद्ध ऊर्जा लाभ महत्वपूर्ण है। इस संभावना ने नीति निर्माताओं के बीच उम्मीदें जगा दी हैं। अमेरिकी ऊर्जा सचिव जेनिफर ग्रैनहोम ने कहा है कि यह सफलता 21वीं सदी की सबसे प्रभावी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक है।
दिसंबर 1938 में जब से जर्मन वैज्ञानिकों ओटो हैन, लिसे मीटनर और ओटो फ्रिस्क ने यूरेनियम परमाणु को सफलतापूर्वक विभाजित किया, तब से परमाणु विखंडन करके हथियार बनाने और शांतिपूर्ण उद्देश्यों, दोनों के लिए दुनिया में महत्वपूर्ण प्रगति देखी गई। जैसा कि हाल ही में क्रिस्टोफर नोलन की ब्लॉकबस्टर फिल्म ओपेनहाइमर में दर्शाया गया है, अमेरिकी सरकार परमाणु विखंडन से हथियार बनाने के लिए तेजी से आगे बढ़ी, यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे बड़े पैमाने पर ऊर्जा निकलती है। 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध अपने अंतिम चरण पर था। जर्मनी हार गया था, पर जापान ने अभी भी हार नहीं मानी थी। अमेरिकियों को लगा कि एक परमाणु बम निर्णायक रूप से उनका पलड़ा भारी कर देगा। जुलाई 1945 में बम का परीक्षण किया गया; अगस्त में हिरोशिमा और नागासाकी पर बमबारी कर दी गई। इसके साथ ही, द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया था।
वैसे परमाणु विखंडन का उपयोग पहली बार बिजली पैदा करने के लिए दिसंबर 1951 में किया गया था। आज दुनिया भर में 440 से अधिक परमाणु रिएक्टर काम कर रहे हैं, जो कुल उत्पादित बिजली का 10 प्रतिशत तक उत्पादन करते हैं।
परमाणु फ्यूजन के माध्यम से ऊर्जा पैदा करने के लिए कच्चा माल हाइड्रोजन है और यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। दूसरी ओर, परमाणु विखंडन में यूरेनियम का उपयोग होता है और यह खनिज सीमित है। इसलिए परमाणु फ्यूजन असीमित व टिकाऊ ऊर्जा का माध्यम बनकर दुनिया में ऊर्जा संकट का समाधान बन सकता है।
बगैर छीजत विद्युत वितरण
22 जुलाई को दक्षिण कोरियाई शोधकर्ताओं - सुकबे ली, जी-हून किम और यंग-वान क्वोन ने भौतिकी को समर्पित वेबसाइट में दो शोध पत्र प्रकाशित किए, जिसमें दावा किया गया कि उन्होंने सफलतापूर्वक एक ऐसा पदार्थ विकसित किया है, जो कमरे के तापमान पर सुपरकंडक्टिविटी हासिल करता है। सुपरकंडक्टिविटी या अतिचालकता एक ऐसी घटना है, जहां कोई पदार्थ बिजली के लिए शून्य या लगभग शून्य प्रतिरोध प्रदान करता है। अभी जिन तारों, धातुओं या माध्यमों से विद्युत का वितरण होता है, उसमें काफी मात्र में बिजली बर्बाद भी होती है। बिजली वितरण के बाद से ही इंसान सदा से इस खोज में रहा है कि कोई ऐसी धातु या मिश्रण मिल जाए, जिसके मार्फत बिना छीजत के अबाध विद्युत वितरण संभव हो सके।
यह पदार्थ, एलके-99, तांबा, सीसा, फॉस्फोरस और सल्फर का संयोजन है, ये पदार्थ कम लागत पर आसानी से उपलब्ध हैं। यह पहली बार नहीं है कि वैज्ञानिकों ने अतिचालकता या सुपरकंडक्टिविटी हासिल की है या हासिल करने का दावा किया है। साल 1911 में डच भौतिक विज्ञानी हेइके कामेरलिंग ओन्स ने पारे में सफलतापूर्वक अतिचालकता हासिल की थी। उन्होंने ऐसा -269 डिग्री सेंटीग्रेड के बेहद कम तापमान पर किया था। इन वर्षों में, अन्य कंडक्टरों ने अतिचालकता प्रदर्शित की है, पर बेहद कम तापमान पर।
बहरहाल, बिजली की होने वाली बर्बादी को रोकना बहुत जरूरी है। विकास के कामों के लिए दुनिया में ज्यादा बिजली चाहिए और उतनी बिजली उपलब्ध नहीं है, अत अगर बिजली की छीजत को खत्म कर दिया जाए, तो यह दुनिया के लिए एक बड़ी सफलता होगी।
कैंसर नाशक दवा
एक अगस्त को अमेरिका में सबसे बड़े कैंसर अनुसंधान और उपचार संगठनों में से एक सिटी ऑफ होप ने एक प्रायोगिक एंटी-कैंसर अणु के बारे में एक अकादमिक पत्रिका में बहुत रोचक और कारगर अध्ययन प्रकाशित किया है, जो स्वस्थ कोशिकाओं को प्रभावित किए बिना कैंसर कोशिकाओं को मारता है। अणु एओएच1996, का नाम अन्ना ओलिविया हीली के नाम पर रखा गया है, जो 1996 में पैदा हुई और 2006 में जिसकी कैंसर से मृत्यु हो गई। उनके माता-पिता द्वारा एकत्र किए गए धन ने इस अणु के विकास या खोज में सहायता की है।
अणु प्रसार करने वाली कोशिका परमाणु एंटीजन (पीसीएनए) प्रोटीन को निशाना बनाती है, जो डीएनए प्रतिकृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाल तक, पीसीएनए को दवाओं के उपयोग से लक्षित करना कठिन माना जाता था। प्रोफेसर लिंडा मल्कास के नेतृत्व में सिटी ऑफ होप में एक टीम को दो दशकों के शोध और व्यापक कंप्यूटर मॉडलिंग की आवश्यकता पड़ी, जिसमें लाखों विभिन्न अणुओं के बीच मेल का अनुकरण और विश्लेषण करना शामिल था, एक ऐसे अणु की खोज के लिए जो कैंसर से प्रभावित पीसीएनए को निशाना बना सकता हो। जब कोई मरीज कैंसर से पीड़ित होता है, तो कैंसर कोशिकाओं में पीसीएनए विशिष्ट रूप से बदल जाता है। ये उत्परिवर्तित पीसीएनए कोशिकाएं हैं, जो तेजी से बढ़ती हैं, जिससे कैंसर फैलता है और अंतत रोगी की मृत्यु हो जाती है।
एओएच1996 केवल उत्परिवर्तित पीसीएनए कोशिकाओं को निशाना बनाता है और उन्हें विभाजित होने व दोषपूर्ण डीएनए की प्रतिलिपि बनाने से रोकता है। यह उपचार पद्धति केवल कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाती है, स्वस्थ कोशिकाओं को छोड़ देती है। अभी तक अधिकांश उपचारों में अच्छी कोशिकाओं और बुरी कोशिकाओं के बीच कोई अंतर नहीं किया जाता है, पर अब ऐसा करना संभव हो जाएगा। पूरे शरीर को होने वाले नुकसान से बचा जा सकेगा।
लौट आएगी याददाश्त
अल्जाइमर आज के समय में सबसे आम समस्या है, जो बुजुर्गों को प्रभावित करती है। यह रोग मस्तिष्क में स्मृति और सोच कोशिकाओं को नष्ट कर देता है और प्रभावित लोगों की संज्ञानात्मक और कार्य क्षमता में लगातार गिरावट आती है। बुजुर्गों में इसकी व्यापकता और अब तक अरबों डॉलर के निवेश के बावजूद वर्तमान में अल्जाइमर का कोई इलाज या यहां तक कि बीमारी को संशोधित करने वाला उपचार भी नहीं है।
अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर पी विजयशंकर कहते हैं, ‘विगत वर्षों में हमने जो पेशकश की, वह एक रोगसूचक उपचार था, जिससे उन रोगियों को ही कुछ राहत मिली, जो बीमारी के शुरुआती चरण में थे।’ अब एली लिली एंड कंपनी द्वारा विकसित दवा डोनानेमेब से स्थिति बदल सकती है।
यह दवा अल्जाइमर से पीड़ित लोगों के मस्तिष्क में जमा होने वाले अमाइलॉइड्स या प्लॉक को हटा देती है और रोग की विकास को धीमा कर देती है। चरण-3 के नैदानिक परीक्षणों में 60-85 वर्ष आयु वर्ग के शुरुआती लक्षण वाले 1,736 प्रतिभागियों में से 36 प्रतिशत में 18 महीनों में रोग में गिरावट देखी गई है, इससे वैज्ञानिक उत्साहित हैं।
विजयशंकर कहते हैं कि पहली बार ऐसी दवा मिली है, जो शुरुआती लक्षण वाले अल्जाइमर रोग वाले लोगों में संज्ञानात्मक और कार्यात्मक गिरावट को धीमा कर देती है। मरीज के व्यवहार में साफ सुधार दिखता है। इसमें मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार लाने और ऐसे मरीजों की देखभाल करने वालों को जरूरी राहत प्रदान करने की क्षमता है। हालांकि, डॉक्टर इस दवा के दुष्प्रभाव को रोकने पर काम कर रहे हैं। परीक्षणों के दौरान दवा से 24 प्रतिशत मामलों में मस्तिष्क में सूजन और 31 प्रतिशत मामलों में रक्तस्राव हुआ। इसके अलावा, परीक्षण में कई मरीज सिरदर्द, भ्रम, उल्टी और दौरे से भी पीड़ित रहे हैं।
डॉक्टर विजयशंकर कहते हैं कि अभी इस दवा के दुष्प्रभाव चिंताजनक हैं, लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है। इस दवा पर अभी और काम होगा। शुरुआती दवा को प्रयोग के अनेक चरणों से गुजारा जाएगा और दुष्प्रभाव को कम से कम करके ही मरीजों तक पहुंचाया जाएगा। एक दिन जरूर आएगा, जब आधुनिक दुनिया में बढ़ती यह बीमारी काबू में आ जाएगी।



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